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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

The Site was down for some time

Namestey ji,
Our site was down for some time due to a virus attack, which made us change our hosting provider as well.
We have also taken this opportunity to upgrade our hosting software.
Unfortunately devanagri typing is not yet enabled. We will work to get that going once again.

Sorry for the inconvenience.
Dhanyavad,
Anupam

Anupam ji Namaste Site ke

Anupam ji
Namaste
Site ke dobara agman par bahut khushi huii. Aaapka bahut 2 Dhanyawad. Kuchh problem shayad ayengi to aap ko batayenge.

Anand

please enable Hindi

please enable Hindi (Hinglish) typing so that I may submit ved mantra SAM VANDANA/Vaidik Sanskar

Rajendra P. Arya
9041342483
rajenderarya49@gmail.com

Unfortunately, that might

Unfortunately, that might take some time. As we have done some custom programming to enable it.

I am waiting site enabling

I am waiting site enabling in HINDI also, how much time it take please do at the earliest.

Rajendra P.Arya
Sangrur-148001
9041342483

Still in "news aggregator"

Still in "news aggregator" new mails do not appear. Any problem?
Bhavesh Merja

om स एष

om स एष पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् || ( योगदर्शन : 1-26 )
वह परमेश्वर कालद्वारा नष्ट न होने के कारण पूर्व ऋषि-महर्षियों का भी गुरु है ।

गीत स्तुति (१)
ओ३म् शंनो मित्र: शं वरुण: शं नो भवत्वर्य्यमा |
शं न इन्द्रो बृहस्पति: शं नो विष्णुर....................................ुरुक्रम: ||ऋग्वेद १|६|१८|८ ||

पाया गुरु मन्त्र बृहस्पति से, फिर अन्य गुरु से करना क्या |
की माँग विश्वपति अधिपति से, फिर और किसी ...से करना क्या...||

...वरणीय वरुण प्रभु वरुपति हों, अर्य्यमा न्याय के अधिपति हों |
हमको परमेश ईशता दो, तुम इन्द्र हमारे धनपति हों ||

...की याचना इन्द्र‌ धनपति से, फिर दर दर हमें भटकना क्या
की माँग विश्वपति अधिपति से, फिर और किसी से करना क्या ||

अत्यन्त पराक्रम बलपति हो, तुम वेद बृहस्पति श्रुतिपति हो |
तन मानस का बल हमको दो, तुम विष्णु व्याप्त जग वसुपति हो ||

की सन्धि शौर्य के सतपति से, फिर हमें शत्रु से डरना क्या |
की माँग विश्वपति अधिपति से, फिर और किसी से करना क्या ||

प्रिय सखा सुमंगल उन्नति हो, हर सम‌य तुम्हारी संगति हो |
बन मित्र मधुरता अपनी दो, सुख वैभव बल की सम्पति दो ||

मित्रता विष्णु प्रिय जगपति से, फिर पलपल हमें तरसना क्या |
की माँग विश्वपति अधिपति से, फिर और किसी से करना क्या ||

(पं. देवनारायण भारद्वाज रचित गीत स्तुति का प्रथम प्रकाश)

स एष पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् || ( योगदर्शन : 1-26 )
वह परमेश्वर कालद्वारा नष्ट न होने के कारण पूर्व ऋषि-महर्षियों का भी गुरु है ।

लेखन:
राजेन्द्र आर्य,
362 ए, सुनामी गेट,गुरुनानकपुरा
संगरूर 148001 (पंजाब)

चलभाष : 9041342483