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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

महर्षि दयानंद की आत्मकथा सम्बन्धी प्रश्न

सभी आर्य बंधुओं तथा बहनों को सादर नमस्ते

कृपया मेरी महर्षि दयानंद के आत्मचरित्र सम्बन्धी शंका का समाधान करें:

कुछ समय पूर्व मैंने इस लिंक: http://www.ved-yog.com/products.php?cat_id=1305540307&par_cat=0 से 'योगी का आत्मचरित्र' नामक पुस्तक डाउनलोड की, जिसके बारे में यह दावा किया गया है, कि यह महर्षि दयानंद का आत्मचरित्र है, जो संस्कृत में लिखा गया था तथा महर्षि ने इसे उनके जीवनकाल में न छापने का निर्देश दिया था | परन्तु उसे देखने के बाद मुझे नहीं लगता कि वह महर्षि दयानंद द्वारा लिखा गया है |

कारण:

(१) उस पुस्तक में योग की सिद्धियों का अत्यंत चमत्कारपूर्ण वर्णन मिलता है | कुछ बातें उनके सत्यार्थ प्रकाश, ऋगवेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रंथों से मेल नहीं खाती |
(२) उनका रानी लक्ष्मीबाई आदि से मिलना भी कुछ प्रमाणिक नहीं लगता | इस वेबसाइट (aryasamaj.org) पर पहले भी इस बात का खंडन किया जा चुका है |
(३) कुछ बातें नवीन अनुसंधानों पर आधारित लगती हैं, तथा उनका भी ऋषि के ग्रंथों से तालमेल का अभाव है | उदहारण के लिए उस पुस्तक में यह दावा किया है कि ईसा मसीह भारत में आये थे तथा यहाँ उन्होंने वैश्यों तथा शूद्रों को पढ़ाया था | उसमे ईसा को एक वैदिक विद्वान् कि तरह प्रस्तुत किया गया है | परन्तु सत्यार्थ प्रकाश में महर्षि द्वारा की गयी ईसाई मत की समीक्षा से इसका मेल नहीं बैठता | उसके अनुसार ईसा अनपढ़ लोगों के बीच थोड़ा बहुत ज्ञान रखने वाले व्यक्ति थे | हो सकता है ईसा कभी भारत आये हों परन्तु जिस रूप उसका वर्णन है यह थोड़ा संदेहास्पद है, तथा स्वामी दयानंद के विचारों के अनुरूप नहीं लगता |
(४) दो तीन वर्ष पहले, श्री भवानीलाल भारतीय जी का एक लेख मेरी दृष्टि में आया था | उसमे स्वामी सच्चिदानंद योगी द्वारा लिखित 'योगी की अज्ञात जीवनी' को काल्पनिक पुस्तक बताया गया था | इस आत्मचरित्र में सम्पादक का लेख देखकर लगता है की यह उसी पुस्तक को अलग नाम से छापा गया है | यह बात भी मेरी शंका को पुष्ट कर रही है |

वैसे सम्पादक ने यह स्पष्ट लिखा है कि महर्षि के ग्रंथों को ही उनके विचारों के लिए अंतिम प्रमाण मानें तथा विसंगतियों को उस समय पौराणिक के पौराणिक पंडितों को प्रभाव जानें | कुछ छोटी मोटी बातें होती तो यह स्वीकार किया जा सकता था परन्तु मात्रा इतनी अधिक है कि यह बात गले से नीचे नहीं उतरती |

कृपया अपना मार्गदर्शन देकर मेरी शंका का समाधान करें |

धन्यवाद

अमित दुआ

Always accept the truth and

Always accept the truth and decline the false

Sorry for my "period of uncertanty".

(1)You should read the explanations of Swami Satyapati Parivrajakacharya on Yog Darshan.He has broken the views of The granth and the so-called vyas bhashya.If we go by logic almost every so-called siddhi is completely impossible.

(2)During 1855-1859 ,he was in the search of a true Guru.If he himself was looking for a master then how could he be master of masters?

(3)You are right.

(4)Well!I have read his books.I found that he goes by logics.So,he can be right.

Satish Arya and some of like minded believes that all of the siddhis mentioned in Yog Darshan are true.But they cannot say it in Arya Samaj.So,now,they have written a book saying that its writer is Maharshi Dayanand.You should read the commentary of Sri Yudhishthir Mimansakji,Acharya Udayaveer ji etc. on this subject by buying some books.They all have discarded the book.No real Arya Samajist believes in that book.Actually,the book was not written by Dayanandji.It was written after his death by some Shakunis present in the Arya Samaj.

Always accept the truth and

Always accept the truth and decline the false

You should read the biography of Swami Dayanand by J.T.F. Jordens.In 12th chapter named "A fake autobiography",the history and rebuttals to "Yogi ka Aatmacharitra" has been provided.

Thanks a lot jvb ji, for

Thanks a lot jvb ji, for your valuable information about the fake about autobiography and the reference of books. I agree with you that a true Arya Samaji cannot accept that book as an autobiography of Swami Dayanand. I have read the views of Swami Satyapati ji also in his books, and attended the Kriyatamak Yog Prasikshan Shivir in Darshan Yog Mahavidyalaya, Rojad, Gujarat, on November 2010. There is no doubt that the books of Swamiji and other Acharyas of Mahavidyalya played a major role in rationalizing my views about Yog.

I am willing to know one more thing, i.e., what are the sources where we can know about him in his own words, apart from Puna Pravachan.

Thanks and regards

Amit Dua