Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

ऋषि का वरदान‌

अरे। आर्य बन्धुओ, तुम्हें तो ऋषि ने आनन्द का भण्डार दे दिया, फिर क्यों लुटे लुटे से फिरते हो? वह भण्डार जिसको पाने के लिए बाकी सभी को किसी चाबी की दरकार रहती है, और कुछ भी न सही तो माथा टेकने की आवष्यक्ता तो रहती ही रहती है| वह भण्डार ऋषि ने तुम्हें मुफ्त में दे दिया| फिर क्यों तुम भटक रहे हो? ऋषि ने तो तुम्हें सीधा आनन्द के स्त्रोत से मिला दिया| बस तुम्हें आखें खोल उसे देखने की आवष्यक्ता है| आओ ले चलूँ तुम्हें उसी आनन्द स्त्रोत की और|
तो दिल थाम कर देखो ।
सकल ब्रह्माण्ड का साफ्टवेयर इस तन के भीतर विराजमान है| इस तन में तुम किसी भी वस्तु के दर्शन,स्पर्षन आदि अनुभव स्पष्ट ही कर सकते हो| अरे । बस अन्दर का कमप्यूटर ही तो चलाना है| किसी की परमिशन यानी आज्ञा की आवष्यक्ता नहीं है| बस आखें बन्द करो|

तन , प्राण , मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार , आत्मा और ....परमात्मा |

इन सब का समन्वय (synchronisation)ही बस तुम्हें करना है| फिर वह , वह बांसुरियों की धुनें अन्दर ही अन्दर पैदा होंगी, जो तन से निकलेंगी और प्रभु रूपी अपार समुद्र में समाती जाएंगी| अब पूरा ब्रह्माण्ड तुम्हारे समक्ष होगा| उमड़ते घुमड़ते बादल, सूर्य, चन्द्र , तारे और क्या नहीं?

ब....स अपने भीतरी साफ्टवेयर को चालू करें| पहले तन ,प्राण , मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार का समन्वय(synchronisation) कर लें आत्म शक्ति से| फिर ओउम् तरंगे तन से निकलती हुई परमात्म‌ देव तक बहती हुई मिलेंगी| पूरे ब्रह्माण्ड का दर्शन भीतर ही भीतर होगा| केवल तुम्हें जागना है| तन, प्राण, मन को स्वस्थ व सजग रखना है|

आइये अन्दर का ब्रह्माण्ड आपकी बाट जोह रहा है| बस आपको इतना ही तो करना है कि अपने तन ,प्राण , मन , बुद्धि , चित्त , अहंकार को समझ लें| इन्हें फिर ओउम् की धुन से झंक्रृत कर दें| फिर‌ वेद मन्त्रों की ध्वनी लहरियों से पुरे ब्रह्माण्ड के दर्शन भीतर इसी ब्रह्माण्ड में कर लें| आत्म शक्ति जब परमात्म शक्ति से मिलेगी, तो वह बल प्राप्त होगा , जिसका वर्णन संभव नहीं|
यही है ऋषि का हमें दिया हुआ वरदान, जो अन्यों को उपलब्ध नहीं है, क्योंकि इस वरदान को पाने के लिए आवष्यक है कि प्रभु की राह में कोई भी रुकावट न हो| अन्यथा उस लोक में पहुँचना संभव नहीं , जहाँ परमात्म देव के दर्शन हों, जहाँ परमात्मा की स्वर लहरियां सुनने को मिलें, जहाँ आनन्द ही आनन्द हो, जहाँ शक्ति ही शक्ति हो||