भक्त कबीर और ऋषि दयानन्द
'पूर्णपुरुष का विचित्र जीवन चरित्र' से उद्धरित
भक्त कबीर और ऋषि दयानन्द दोनो ही अजर अमर निराकार परमात्मा के पुजारी थे और अवतार वाद का खण्डन करके उसी एक ईश्वर की पूजा का प्रचार करते थे, जहां महर्षि जी ने वेद मन्त्रों से परमेश्वर को अजर , अमर, निराकार सिद्ध किया, और सारे देश में वेदों के आधार पर इसका प्रचार किया| और इसके संबन्ध में बड़े बड़े पण्डितों से शास्त्रार्थ करके अपने इस सिद्धान्त को स्थापित किया| वहां भक्त कबीर का निम्नलिखित दोहा भी इस सिद्धान्त का समर्थन करता है|
कबीरा सब मुर्दन के ग्राम|
जो कोई आया रह न पाया किस किस का लीजे नाम|
सूर्य मरेगा, चन्द्र मरेगा, मरेगा धरत आकासा|
तेतींस करोड़ देवता मरेंगे, जिनकी झूठी आसा|
राजा मरेंगे, रंक मरेंगे, मरेंगे वैद्य और रोगी|
योगी मरेंगे जंगम मरेंगे, मरेंगे विरक्त और भोगी|
नौ मरेंगे,ग्यारह मरेंगे, मरेंगे सिद्ध चौरासी|
कहत कबीर हम उसको पूजें,जिसको काल न खासी|
फिर कहा
कंकर पत्थर जोड़ के मस्जिद लई बनाए,
इस पर मुलां बांग दे बहरा हुआ खुदाय|
और
ईश्वर के जिस स्वरूप की पूजा महर्षि खुद करते थे, और जिस स्वरूप की पूजा का जनता को उपदेश करते थे, उसका आर्यसमाज के दूसरे नियम में वर्णन है|
ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरूप, निराकार, सर्व शक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, अन्तर्यामी, अजर, अमर. अभय, नित्य पवित्र और सृष्टी कर्त्ता है| उसी की उपासना करनी योग्य है||
