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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेदों का इन्द्रिय निग्रह के विषय में आवश्यक उपदेश

रुचं ब्राह्म्यं जनयन्तो देवाs अग्रे तद्ब्रुवन् ।

यस्त्वैवं ब्राह्मणों विद्यात तस्य देवाs असन् वशे ॥२१॥

=(रुचं ब्राह्म्यं) जो ब्रह्म का ज्ञान है , वही अत्यन्त आनन्द करनेवाला और उस मनुष्य की उसमें रुचि का बढ़ाने वाला है । जिस ज्ञान को विद्वान लोग अन्य मनुष्यों के आगे उपदेश करके उनको आनन्दित कर देते हैं । (यस्तवैवं ब्राह्माणों) जो मनुष्य इस प्रकार से ब्रह्म को जानता है , उसी विद्वान के सब मन आदि इन्द्रिय वश में हो जाते है , अन्य के नहीं ॥२१॥

अपौरुषेय वेद यहाँ स्पष्ट कह रहे हैं कि ब्रह्म का ज्ञान ही अत्यंत आनन्द करने वाला है । यही सुख का मूल है । अनन्त काल से विद्वान लोग इस ज्ञान को अन्य मनुष्यों को उपदेश करके उन्हे भी आनन्दित करते रहे हैं । यहाँ स्वामी दयानन्द जी स्पष्ट लिखते हैं कि ''जो मनुष्य इस प्रकार से ब्रह्म को जानता है , उसी विद्वान के सब मन आदि इन्द्रिय वश में हो जाते है , अन्य के नहीं"

इससे यह भी स्पष्ट है कि आर्य्यावर्त्त के इतिहास में जितने भी "सन्त" "महात्मा" लोग उदाहरणार्थ- गौतम बुद्ध, आदि की मन आदि इंद्रिय वश में नहीं थी क्योंकि ये ब्रह्म को नहीं मानते थे अथवा नास्तिक थे ।