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संस्कार विधि जैसा कि मैंने जाना | Aryasamaj
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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

संस्कार विधि जैसा कि मैंने जाना

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बहुत दिनों से आर्यसमाज में एक बहस छिडी है कि अयन्त इध्म आत्मा मंत्र से समिधाधान करें या नही? कुछ विद्वान इसका समर्थन करते हैं कुछ नही भी करते हैं। दोनों पक्षों के तर्कों को सुनकर मैंने जब संस्कार विधि का अध्ययन किया तो इसकी मूल में जाने हेतु मुझे संस्कार विधि की मूल प्रति की आवश्यकता पडी जो वैदिक यन्त्रालय अजमेर में रखी हुई है। एक सज्जन पुरुष की सहायता से मुझे उस प्रति के दर्शन हुये। परन्तु मुझे जो प्रतियां मिली वो एक नही अपितु दो थी, एक मूल प्रति दूसरी संशोधित प्रति। संस्कार विधि की भूमिका के अनुसार मूल संस्करण विक्रमी संवत् 1932 कार्तिक कृष्ण पक्ष बदी 30 दिन शनिवार को तथा विक्रमी संवत् 1940 आषाढ बदी 13 दिन रविवार को स्वामी दयानन्द सरस्वती जी द्वारा पुनः संशोधन करके दूसरा संस्करण छपवाने पर विचार किया गया। इस दृष्टि से देखा जाये तो लगभग आठ वर्ष तक स्वामीजी के अनुयायी मूल संस्कार विधि से ही यज्ञ कराते रहे। अब आठ साल के बाद उनको संशोधन की आवश्यकता क्यों महसूस हुई ? आइये इस पर विचार करते हैं।
संस्कार विधि की भूमिका के अनुसार ऋषि लिखते हैं संशोधन इसिलिये किया है कि उन विषयों का यथावत् क्रमबद्ध संस्कृत के सूत्रों में प्रथम लेख किया था। उसमें सब लोगों की बुद्धि कृतकार्य नही होती थी, इसिलिये अब सुगम कर दिया है, क्योंकि संस्कृतस्थ विषय विद्वान लोग समझ सकते थे साधारण नही। क्योंकि मूल प्रति में संस्कृत पाठ तथा भाषा पाठ एकत्र लिखा था इस कारण संस्कार करने वाले मनुष्यों को संस्कृत और भाषापाठ दूर दूर होने से कठिनाई होती थी। दोनों संस्करणें में अन्तर ये रहा कि जो जो विषय प्रथम संस्करण में अधिक लिखा था उसमें से अत्यन्त उपयोगी न जानकर छोड भी दिया है और अबकी बार जो अत्यन्त उपयोगी विषय है वह वह अधिक भी लिखा है।
परन्तु जब मुझे सन् 1902 की छपी हुई संस्कार विधि की प्रति प्राप्त हुई (जो कथित संशोधन से लगभग 19 वर्ष बाद वैदिक यन्त्रालय अजमेर ने छापी थी) तो मैंने देखा कि उसमें ऋषि ने प्रथम समिधा के लिये अयन्त इध्म आत्मा मंत्र दिया ही नही है। उसमें तीन समिधाओं के लिये यजुर्वेद के तीसरे अध्याय के प्रथम तीन मंत्रों का विनियोग किया है। जिससे पता चला कि यह संशोधन ऋषि ने नही अपितु किसी अन्य व्यक्ति ने किया है। मिलावट कितनी भी सावधानी से की जाये नजर आ ही जाती है। मूल प्रति में अयन्त इध्म आत्मा मंत्र लिखने हेतु जगह ही नही है परन्तु मिलावटी महाशय ने संशोधित प्रति में मंत्र लिखने की जगह न होते हुये भी मंत्र को जबरन घुसेड दिया भले ही वह साइड में लिखना पडा है। परन्तु सोचने वालेश्य हैद्दद्दद्दद्दी बात ये है कि यदि उक्त संशोधन ऋषि ने किया था तो यह मंत्र 1902 में छपी संस्कार विधि में क्यों नही है?
मिलावटी महाशय ने मंत्र तो लिख दिया परन्तु समिधाधान की ऋषिकृत विधि में संशोधन करना कैसे भूल गये? उनकी इस भूल ने आर्य समाज में एक नये विवाद को जन्म दे दिया है। मंत्रों के पहले लिखी विधि में स्पष्ट आदेश है कि एक मंत्र से एक एक समिधा अग्नि में चढावें परन्तु इससे और इस मंत्र से अर्थात् दोनों मंत्रों से दूसरी यह पाठ कहां से आया? 1902 में छपी संस्कार विधि में अयन्त इध्म मंत्र के न होने से यह विसंगति भी उपस्थित नही है।
सबसे सोचने वाली बात ये है कि इस मंत्र से पहले और बाद के मंत्रो (जिन वेद मंत्रों की संज्ञा विधि है) का भाव देखें तो वे यज्ञ कुण्ड में उपस्थित भौतिक अग्नि की वृद्धि से संबंध रखते हैं, परन्तु इस मंत्र का भाव यज्ञ को विषयान्तर करता प्रतीत होता है। क्योंकि अभी तो हमनें यज्ञ को आरम्भ भी नही किया है और अभी से हम प्रभू से अपने लिये पांच पांच पदार्थों की प्रार्थना करने लग जायें? क्या ये आपकी दृष्टि में ठीक रहेगा?
एक और बात जहां से यह मंत्र लिया गया है आश्वलायन गृहसूत्र 1।10,12।। वहां पर इसका अर्थ देख सकते हैं। अर्थानुसार यह सूत्र यज्ञविधिपरक प्रतीत नही होता है। यज्ञ में जहां जहां प्रार्थना विषय के मंत्र हैं, वहां ऋषि ने केवल प्रार्थना भाव के ही मंत्र रखे हैं और जहां विधिपरक भाव के मंत्र हैं वहां वहां विधिपरक मंत्र ही रखे हैं। फिर विधिपरक मंत्रों के बीच में प्रार्थना भाव के मंत्र की उपस्थिति शंका उत्पन्न करती है।
मैं वैदिक जगत का कोई विद्वान नही हूं। परन्तु ये विसंगतियां मुझे भी उद्वेलित करती हैं। मैं प्रयास करता रहता हूं कि आर्य समाज के चैथे नियम का पालन जितना हो सके कर सकूं।बस इतना सा उद्देश्य है मेरा कि आप आर्यजन भी इस नियम का पालन करें।जिनको 1902 में छपी संस्कार विधि के दर्शन करने की इच्छा हो वे सज्जन आर्य समाज विश्व बैंक कानपुर के कार्यालय में आकर प्राप्त कर सकते हैं। धन्यवाद नमस्ते

विदुषामनुचर पं0 रवीन्द्र कुमार आर्य आर्य समाज विश्व बैंक कानपुर नगर 05122680045/9389172290

kahi swami dayanand ko arya

kahi swami dayanand ko arya samaji hi na kha jaay.aane wale vishwa me swamiji ek pakhandi ke rup me na darshaye jaay jaisa ki ram,krishna,hanumanadi ke sath kiya gaya.sab log alas tyag dein to hi sukh hai.alas me sukh nai hai balki usme dukh hai.