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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सर्प – वृत्ति का त्याग (प्रणेता: पं. देव नारायण भारद्वाज

सर्प – वृत्ति का त्याग (प्रणेता: पं. देव नारायण भारद्वाज)

ओं अहिनां सर्वेषां विशं परा वहन्तु सिन्धव: !
हतातिरशचि राजयो निपिश्टास: प्रदक्वा: !! अथर्ववेद १०.४.२०

विष कल्मष सब दूर बहाएं !
ज्ञान सुधा की जल धाराएँ !
सर्प सरीखी मन की गतियाँ,
पर पीडक हिंसक गति विधियां !
गहन सिंधु में इन्हें डुबाएं ,
निर्मल हृदय प्रवाही नदियाँ !
रत्नाकर से मुक्ता लाएं,
ज्ञान सुधा की जल धाराएँ !!

जब जागरूक हो मन मयूर,
तब विषधर रहते दूर दूर,
अवगुण अज्ञान खिसक जाते,
सदगुण गहते भरपूर शूर !
कीर्ति प्रभा से तन चमकाएं !
ज्ञान सुधा की जल धाराएँ !!

बधिक वृतियां, अत्याचारी,
कुटिल कृतियाँ, वक्र विधारी,
कर्कश वाणी, व्यंग्य बाण सी,
अशुभ उक्तियां, अहि फुन्कारी !
मधुर बोल बल विमल बनाएँ ,
ज्ञान सुधा की जल धाराएँ !!

प्रेषक: राजेन्द्र आर्य (362-A, Guru Nanak Pura, Sunami Gate, Sangrur-148001)
Mobile Number: 09041342483

Submitted by Rajendra P.Arya

Submitted by Rajendra P.Arya on Fri,
2012-03-16 10:31. भजन/कविता
अष्टांग योग साधना :
साधक बनकर करो साधना अमृत का भंडार मिलेगा !
मानव जीवन सफल बनेगा परमेश्वर का प्यार मिलेगा !
साधक बनकर करो साधना ..............................
सत्य अहिंसा को अपनाना ब्रहमचर्य को धारण करना !
चोरी तजना लोभ त्यागना अपने दोष निवारण करना !
परम प्रभु के पवन पथ पर बढ़ने का अधिकार मिलेगा !
साधक बन कर करो साधना ...............................
शौच तथा संतोष संवारें तन का चोला मन का दर्पण !
ताप स्वाध्याय निरंतर होवे ईश्वर के प्रति आत्म समर्पण !
याम नियमों का पालन करिये भक्ति को आधार मिलेगा !
साधक बन कर करो साधना ..................................
आसन प्राणायाम के द्वारा स्वस्थ निडर बलवान बनोगे !
करके प्रत्याहार धारणा योगनिष्ठ इंसान बनोगे !
अन्तः करण पवित्र बनेगा शुद्ध सरल व्यवहर मिलेगा !
साधक बन कर करो साधना .................................
लींन हुए जब ध्यान लगा कर प्रभु-द्वार तक आ
जाओगे !
लगी समाधी मिली सफलता
परम तत्त्व को पा जाओगे !
करो ‘पथिक’ अष्टांग योग फिर समय न बारम्बार मिलेगा !
साधक बन कर करो साधना ..................................
प्रेषक :
राजेंद्र आर्य
संगरूर (पंजाब)
9041342483