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अयन्त इध्म आत्मा मन्त्र | Aryasamaj
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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अयन्त इध्म आत्मा मन्त्र

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प्रस्तुत छायाप्रति हवन मन्त्राः नामक पुस्तक की है जो सन 1902 और संवत 1958 के आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को वैदिक यन्त्रालय अजमेर द्वारा प्रकाशित की गयी थी। इसमें मुख्य पृष्ठ पर संस्कृत भाषा में लिखा है कि यह पुस्तक शुभ कर्मों में उपयोग हेतु है। यह भी लिखा है कि यह पुस्तक संस्कारविधि ग्रंथ से अलग है। यह इस पुस्तक का चैथा संस्करण है जिसमें यह पुस्तक दस हजार की संख्या में छापी गयी है, इससे पूर्व तीन संस्करण छप चुके हैं आप सोच सकते हैं कि कितनी पुस्तकें उक्त तिथि तक छप चुकी हैं। इसी अनुपात में लें तो लगभग चालीस हजार।
इस पुस्तक के पृष्ठ संख्या 9 पर आप देखें प्रथम समिधा के लिये अयन्त इध्म आत्मा मन्त्र का प्रयोग नही किया गया है।
चालीस हजार पुस्तकें छप गयी बिना अयन्त इध्म आत्मा मन्त्र के और किसी विद्वान का कोई विरोध नही?
सोचा आपने क्यों?
क्योंकि या तो अयन्त इध्म आत्मा मन्त्र को विद्वान लोग दबी जुबान में प्रक्षिप्त स्वीकार करते हैं,या फिर आर्य जगत में यज्ञविधि में असमानता फैलाने का ये कोई षडयन्त्र है।
ऐसा कैसे हो सकता है कि एक ही मुद्रण संस्थान एक मन्त्र को ऋषि द्वारा लिखा गया मानता भी है और वही मन्त्र अपनी एक पुस्तक में छापता है दूसरी पुस्तक में नही छापता है।
इसका अर्थ है कि परोपकारी सभा ये मानती है कि उक्त मंत्र से समिधाधान नही करना चाहिये। उक्त मन्त्र प्रक्षिप्त है। परन्तु प्रायश्चित के स्थान पर उक्त मन्त्र आज भी संस्कार विधि तथा अन्य यज्ञ विधि की पुस्तकों में छापा जा रहा है।
संस्कारविधि के छापने का सर्वाधिकार सुरक्षित होने का ये मतलब तो नही है कि आपके मन में जो आये छाप दें,और जो न आये उसे छोड दें।
स्वामी दयानन्द कहते हैं कि प्रत्येक का आत्मा सत्य असत्य का जानने हारा है परन्तु दुराग्रह और स्वार्थ की पूर्ति हेतु इच्छित विषय पर झुक जाता है। सब विद्वानों के अंतःकरण में स्थित वह परमात्मा सत्य और असत्य का निर्णय देता है। सब विद्वान जानते हैं कि सत्य क्या है और असत्य क्या है इसिलिये इस बारे में कोई कुछ नही बोलता है,जबकि यह विशेष आवश्यकता है कि ऋषि दयानन्द के ग्रंथों से मिलावट को दुूर किया जाये और उनको पुनः शुद्ध स्वरुप में स्थापित किया जाये। विद्वान लोग ये बहाना करते हैं कि हममें इतनी योग्यता कहां कि ऋषि के ग्रंथों में संशोधन करें। पर मैं कहता हूं कि अगर मूर्ख और छली लोग ऋषि ग्रंथों में प्रक्षेपण कर सकते हैं तो आपकी योग्यता क्या उन लोगों के बराबर भी नही है। क्या ऋषि के मन्तव्य को स्पष्ट करके संसार का उपकार करना हमारा कर्तव्य नही है?अगर हम नही करेंगें तो कौन करेगा? नमस्ते