Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

ANAND PRAPTI KE LIYE - ON WAY TO BE BLESSED

ओ3म्
आनन्द प्राप्ति के लिए
सुधा सावंत

एक दिन वेदपाठ की कक्षा में चर्चा चल रही थी कि हम शिक्षा क्यों प्राप्त करना चाहते हैं ,क्या लाभ है इससे । छात्राओं में से किसी ने उत्तर दिया कि ज्ञान प्राप्ति के लिए ,किसी ने कहा सुख के लिए,किसी ने कहा आनन्दप्राप्ति के लिए ,मोक्षप्राप्ति के लिए ।किसी ने भी धनप्राप्ति को शिक्षा का उद्देश्य नहीं बताया ,सुनकर अच्छा लगा । आचार्या जी ने हंस कर कहा –यह ठीक है कि हम अच्छी शिक्षा पाकर दुखों से छूट जाते हैं ,सही मार्ग पर चलते हैं ।, परंन्तु सच्चे आनन्द की प्राप्ति कैसे होगी , समझाने के लिए उन्होंने अथर्ववेद के एक मंत्र का पाठ किया जो इस प्रकार था ---
नाम नाम्ना जोहवीति पुरा सूर्यात् पुरोषस
यदज प्रथमं संबभूव स ह तत्व््राज्यमियाव,यस्मान्नान्यत् परमस्ति भूतम् ।
अथर्ववेद—10-4 -31
अर्थात् वह ईश्वर ,परम आनन्दमय अपने निज नाम ओ3म् से जाना जाता है । उसे जानने के लिए ईश्वर के गुणों के आधार पर हम अनेक नामों से उन्हें पुकारते हैं ,वह परमेश्वर सूर्य से पहले विद्यमान था उषा से भी पहले विद्यमान था ।वह अपने स्वराज्य का सम्राट है उससे श्रेष्ठ इस जगत में अन्य कोई नहीं है ।हम भी यदि सच्चिदानन्दमय ईश्वर को जानना चाहते हैं तो ईश्वर की अनुभूति के लिए हम सूर्योदय से पहले उठें ,उषा से भी पहले उठें ,शांत मन से उनका ध्यान करें बारबार ईश्वर के गुणों का ध्यान करें तो मन में आनन्द की अनुभूति होगी
आचार्या जी ने यह भी बताया कि हम जानें कि हमारा शरीरपांच कोषों से निर्मित है ।अन्नमय कोष ,प्राणमय कोष ,मनोमय कोष ,ज्ञानमय कोष और आनन्दमय कोष ।हम इन्ही पांच कोषों के आधार पर अपने लक्ष्य की ओर बढते है।हम इन कोषों को समझें और अपने नियंत्रण में रखें ।अन्नमय कोष,यह हमारा स्थूल शरीर है । अच्छे भोजनसे पौष्टिक तत्वों से हम इसे स्वस्थ बनाते हैं ।

श्वास –प्रश्वास प्राणमय कोष कहलाता है । प्राणायाम के द्वारा हम प्राणमय कोष पर नियंत्रण प्राप्त करते हैं ।मन की प्रवृत्ति ,हमारे विचार मनोमय कोष कहलाता है श्वास प्रश्वास पर के सहारे हमारा मन हमारे वश में आ सकता है अर्थात् प्राणायाम के द्वारा हम अपनी चित्तवृत्ति को ,अपने विचारों को अपने वश में कर सकते हैं । पतंजलि ऋषि ने योग की परिभाषा करते हुए लिखा था—योग चित्तवृत्ति निरोध ।योग के द्वारा मन के विचारों को रोका जा सकता है ,मन की चंचलता को वश में किया जा सकता है ,क्योकि मन हमारे प्राण के साथ इधर-उधर जाता है ।मन को एकाग्र करने के लिए एकमात्र उपाय है कि हम अपने श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण रख कर उसे एक स्थान पर केन्द्रित करें ,ओ3म् का स्मरण करते हुए ध्यान लगाएं ।
मंत्र में कहा गया है कि ध्यान सूर्योदय से पहले ,उषाकाल से भी पहले लगाने का प्रयत्न करना चाहिए।नित्य कर्म करके शान्तमन से ध्यान लगाने के लिए,प्राणायाम के लिए, यह समय उचित भी है ।इस समय हमें चाहिए हम बार-बार एकाग्र मन से ईश्वर को याद करें । ईश्वर के प्रकाश की ओर ध्यान केन्द्रित करें । प्रयत्न करने पर हम कुछ कुछ अनुभव करने लगेंगे । ईश्वर सृष्टि से पहले भी अपने इसी सर्वशक्तिमान रूप में विद्यमान था औरअब भी है ।हमें ईश्वर की अनुभूति के लिए अपने अंदर योग्यता जगानी होगी ।बाहरीदुनिया की चमक-दमक से अपने मन को अन्तर्मुखी करके हम योगसाधना की ओर बढ सकते हैं.
मंत्र में कहा गया है कि ईश्वर सम्राट है ,संपूर्ण सृष्टि का एकमात्र स्वामी है ,संपूर्ण दृश्यजगत का एकमात्र नियंता है, हम उस परम शक्ति की अनुभूति अपनी आत्मा में चाहते हैं तो हम भी स्वराट होकर जीवन बिताएं । हमारी आत्मा इन इन्द्रियों का स्वामी है ।हम
इन इन्द्रियों के गुलाम होकर जीवन न बिताएं , इन्हें अपने वश में रख कर इनसे काम लें ।आज सामान्यतया हम यह देखते हैं कि हम अच्छा खाने के लिए या कुछ नया देखने-सुनने के लिए इधर -उधर भागते ही रहते हैं जैसे ये इन्द्रियां हमें नचा रही हैं और हम इनके गुलाम बने नाच रहे हैं ।आवश्यकता है कि हम अपनी इन इन्द्रियों को संयमित करें .एकाग्र करें और अपनी आत्मिक शक्ति को पहचानें ।जब हम आत्मशक्ति को पहचान जाएंगे तो धीरे –धीरे उस ईश्वर की शक्ति को भी अपने आस-पास अनुभव करने लगेंगे ।ईश्वर के सच्चिदानन्द रूप को समझने लगेंगे और अपने मन में आनन्द की अनुभूति करने लगेंगे।सच्चे अर्थों में आनन्द प्राप्ति का यही एक उपाय है ।
Email : Sanskrit.sudha@gmail.com Phone: 0091-120-2454622