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ब्रह्मजाया- कन्या गर्भ से मातृ शक्ति तक वेदोपदेश ऋग्वेद 10.109 और अथर्ववेद5.17 | Aryasamaj
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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

ब्रह्मजाया- कन्या गर्भ से मातृ शक्ति तक वेदोपदेश ऋग्वेद 10.109 और अथर्ववेद5.17

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Brahmjaayaa

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: !
यत्रेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया: !!
जहां महिलाओं को सम्मान मिलता है वहां समृद्धि का राज्य होता है.
जहां महिलाऑ का अपमान होता है, वहां की सब योजनाएं/ कार्य विफल हो जाते हैं.
यह वैदिक काल की विशिष्ट रूप से एक भारतीय परंपरा है, जो विश्व की किसी अन्य सभ्यता में नहीं मिलती.
आधुनिक विश्व समाज जब किसी महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता है, तब उस मुद्दे पर एक दिवस निर्दिष्ट कर के समाज का ध्यान उस ओर आकर्षित किया जाता है.. इसी कडी में 'एक दिवस बाल कन्याके नाम भी निश्चित किया गया है. इस दिवस को समाज में कन्याओं की परिस्थिति पर आत्मचिंतन करने का अवसर मिलता है. पश्चिम की नकल में संभ्रांत शिक्षित वर्ग की महिलाओं के लिए भारतीय समाज में पुरुषों से समान अवसर प्राप्त करने के लिए आंदोलन करना भी एक मुद्दा बन जाता है.
. स्वामी विवेकानंद जी से 1890 के अमेरिका के प्रवास में एक अमेरिकन ने पूछा, कि क्या भारत में महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा दिया जाता है ? वाक्‌पटु स्वामी जी का उत्तर था नहीं.
उन के इस उत्तर को सुन कर अनेक श्रोतागण आश्चर्यचकित रह गए. तब स्वामी जी ने कहा नही, भारत में महिलाओं को पुरुषों से बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता, महिलाओं को तो भारत मे पुरुषों से उच्च स्थान दिया जाता है.
आधुनिक भारतीय समाज की स्थिति का अवलोकन करने पर आज, हम देखते हैं कि
1. महिलाओं पर अत्याचार, कन्या भ्रूण हत्या, महिलाओं के अभद्र प्रदर्शन का आर्थिक लाभ के लिए दुरुपयोग एक साधारण बात है.
2. हमारे निर्वाचित नेता, प्रिय नेता, अभिनेता सब हमारे अपने समाज के सदस्यों द्वारा लगातार हिंसक हमलों के डर से उच्च सुरक्षा से घिरे रहते हैं ,
3. सरकारों के सब प्रयासों के बावजूद भूख, गरीबी, सामाजिक मूल्यों का ह्रास, चरित्र और जीवन यापन में शिक्षा की अनुपयोगिता, शैक्षणिक, आर्थिक असमानता बढती जा रही है.
4. सब वस्तुओं खाद्य पदार्थों मे मिलावट, और खाद्य उत्पादन की लगातार घटती स्थिति,और उस से प्रभावित समाज मी नए नए रोगों की महामारी बड़ी चिंता के विषय हैं.
5. प्रतिकूल जलवायु परिवर्तन हमारे नियंत्रण से बाहर होते लगते हैं.
6. पारिवारिक सम्बंध समाप्त होते जा रहे हैं.
7. वृद्धों की, ग़रीबी की , बेरोज़गारी की समस्याओं का कोई समाधान नही दीखता.
8. सभी विज्ञान और प्रौद्योगिकी के आधुनिकतम अच्छे इरादों योजनाओं के बावजूद, स्थिति नियंत्रण से बाहर होती दीखती है.
9. सरकारी कर्मचारियों के वेतन और सुविधाओं में लगातार वृद्धि के बावजूद ईमानदारी से अपना अपना कार्य कर के समाज में अपना दायित्व निभाता कोई नही दिखता.
10.सत्य कहने जानने के साधन उपलब्ध नही हैं,
11.योग्य शिक्षित वर्ग की उपेक्षा एक नियम बन गई है,
12. दैनिक निर्दोष लोग हिंसा और दूसरे अपराधों को झेलते हैं.
13. विज्ञापनों मे झूठी बातों का प्रचार आज हमारे समाज के सब कार्य और योजनाओं को विफल करते दीखते हैं
बडा विस्मयकारी होगा यदि यह बताया जाए कि जिस समाज मे कन्याओं महिलाओं का शोषण होता है उस समाज ही में ऐसी स्थिति का पाए जाने का वेदों में पूर्ण रूपेण वर्णन मिलता है.
. वेदों के अनुसार समाजिक मूल्यों के विघटन का कारण, समाज निर्माण के कार्य में महिलाओं की भूमिका को न समझना और महिलाओं की उपेक्षा होता है.
मातृशक्ति की भूमिका संतान के मानसिक और शारीरिक निर्माण में गर्भ से ही आरम्भ होती है. संतान में बाल्यकाल से समाजिक मूल्यों की अवधारणा, प्राकृतिक सौन्दय के प्रति चेतना, श्रेयस में रुचि मातृ शक्ति की ही समाज को देन होती है. प्रकृति ने जन्म से ही स्त्री जाति को अपने इस सामाजिक दायित्व को निभाने के लिए सक्षम बनाया है.
कोई भी शिक्षण संस्था मातृशक्ति की राष्ट्र निर्माण मे इस भूमिका की कमी का पूरक कभी नही हो सकती.
वेदों से

मूलत: इस विषय को ब्रह्मवाणी के रूप मे ऋग्वेद के 7 मन्त्रों के 10/109 सूक्त में ऋषि जुहूर्नामब्रह्मवादिनी/ब्रह्मपुत्र ऊर्ध्वनमवा ब्राह्मा,देवता विश्वेदेवा द्वारा प्रतिपादित किया गया है.उसी विषय को सविस्तार ऋषि मयोभू: ने 11 मन्त्र और जोड कर अथर्व वेद के 18 मन्त्रों के सूक्त 5/17 मे प्रस्तुत किया है.

1.मूल में स्त्री जाति की संरचना में परमेश्वर की योजना
1.तेS वदन् प्रथमा ब्रह्मकिल्विषे S कूपार: सलिलो
मातरिश्वा ! वीडुहरास्तप उग्रं मयोभूरापो देवी: प्रथमजा: ऋतस्य !! ऋ10/109/1, अथर्व 5/17/1

प्रथमा = आरम्भ में, at the very beginning ब्रह्मकिल्विषे = परमेश्वर द्वारा सृष्टि उत्पत्ति के पुण्य कार्य की, समाज/संसार की अवनति को रोकने के लिए, देवी: प्रथमजा = परमेश्वर ने प्रथम उत्पन्न कन्या की आवश्यकता प्रतीत की ऋतस्य = ऋत द्वारा सम्पन्न इस के लिए सृष्टि उत्पन्न करने वाले परमेश्वर के प्रतिनिधि, अकूपार:, सलिल:, मातरिश्वा:=आदित्य, सलिल, और वायु ते S वदन् = (ने नवजात कन्या को विशेष सामर्थ्य प्रदान करने के बारे) में मन्त्रणा की वेद के अनुसार “वीडुतापउग्रं ” = तप द्वारा अर्जित बलवानों की उग्रता, जैसे रामायण काल मे उग्र बलशाली रावण जैसे राक्षसों का अहंकार भरा मतान्ध आचरण, या महाभारत काल मे दुर्योधन का आचरण , या आधुनिक काल मे बलशाली तानाशाहों के दमनाचार,अपने बल पौरुष के अहंकार मे अंधे पापाचारियो द्वारा कन्या भ्रूण हत्या, महिलाओं का अपहरण, बलात्कार और स्वार्थ वश , अल्पबुद्धि, समाज का शोषण इत्यादि ही समाज की अवनति का कारण होते हैं.

वीडुहरास्तप उग्रं = इस उग्र पापाचारी शक्ति को हरने के लिए ‘उन की गर्मी’ को ठन्डा करने के लिए मयोभूरापो = जल की शीतलता जैसे गुणों से संसार मे सुख प्रदान करने के लिए ( उग्र हिंसक वृत्ति की दावानल जैसी पापाचारी अग्नि रूप शक्तियों को जल से शान्त कर करने के लिए) परमेश्वर ने देवी: प्रथमजा प्रथम मे कन्या girl child रूपि देवी को बनाया.

2- सोमो राजा प्रथमो ब्रह्मजायां पुनः प्रायच्छदहृणीयमानः ।
अन्वर्तिता वरुणो मित्र आसीदग्निर्होता हस्तगृह्या निनाय॥
ऋ10-109-2,अथर्व 5-17-2
सोमस्य जाया प्रथमं गन्धर्वस्तेऽपरः पतिः।
तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः॥ अथर्व 14-2-3,
सोमस्य प्रथमो विविदे गन्धर्वो विविद उत्तर: ।
तृतीयो अग्निष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजा ॥ ऋ 10-85-40
सोमो ददद्‌ गन्धर्वाय गन्धर्वो ददग्नये।
रयिं च पुत्रश्चादादग्निर्मह्यमथो इमाम्‌॥ अथर्व14-2-4, ऋ10-85-41

इन तीन वेद मन्त्रों में कन्याओं के मनोवैज्ञानिक एवम शारीरिक विकास की क्रमश: तीन अवस्थाओं के बारे मे बताया है.

1. मानसिक विकास चरण :लगभग 4से 5 वर्ष की आयु तक बच्चों की शारीरिक विकास से पूर्व मानसिक विकास अधिक होता है. इस अवस्था मे विज्ञान के अनुसार मानव शरीर मे “ रुधिर मस्तिष्क बान्ध” (blood brain barrier) का विकास अभी पूरा नही होता. अपनी माता से शिषु द्वारा ग्रहण किया गया सारा पोषण बच्चे के मस्तिष्क और ज्ञानेन्द्रियों का ही मुख्यत: विकास करता है. इस अवस्था मे वेदों मे अलन्कारिक भाषा मे सोम को कन्या प्रथम (अमूर्त) पति बताया है.
( सोम यहां मस्तिष्क और बुद्धिजन्य सब इन्द्रियों का प्रेररक है)
2. शारीरिक विकास चरण :
“ रुधिर मस्तिष्क बान्ध” (blood brain barrier) बन जाने के बाद और यौवन विकास से पहले बच्चे का आहार मुख्यत: उस के शारीरिक विकास मे जाता है.
यहां जैमनीय ब्राह्मण में मिलता “गन्धो मे मोदो प्रमोदो मे । तन्मे युष्मासु(गन्धर्वेषु)”॥ इस अवस्था मे कन्याओं मे स्वाभाविक ललित कलाओं मे रुचि जागृत होती है. गायन, नृत्य, कविता, नाट्य मंच, हस्तकला, मूर्ति कला, प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति संवेदना, माधुर्य, सौन्दर्य प्रेम, सजावट, सुख सुविधा सौम्यता, इत्यादि. गुण कन्याओं मे स्वभाविक रूप से विकसित होते हैं.
इस अवस्था मे वेदों ने गन्धर्वों को कन्या का दूसरा अमूर्त पति बताया है.
3. कौमार्यवस्था ;
रजोदर्शन के पश्चात कुमारियों मे कामाग्नि का विकास होता है.
इस अवस्था में अग्नि कामाग्नि कन्या को अमूर्त पति माना.
4. तुरीय चौथी अवस्था में मनुष्य भौतिक पति के रूप में प्राप्त होता है. इस अवस्था को प्राप्त करने पर कन्या मूर्त रूप पति प्राप्त करने की स्थिति प्राप्त करती है.

3-हस्तेनैव ग्राह्यआधिरस्या ब्रह्मजायेयमिति चेदवोचन्‌ ।
न दूताय प्रह्ये तस्थ एषा तथा राष्ट्रं गुपितं क्षत्रियस्य॥
ऋ 10-109-3अथर्व 5-17-3
तीसरी अवस्था में कौमार्यावस्था के आरम्भ मे, कन्याओं को (पापाचारियों से) सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने को क्षत्रियों द्वारा राष्ट्र की सुरक्षा जितना महत्व दिया है.

4-यामाहुस्तारकैषा विकेशीति दुच्छनां ग्राममवपद्यमानाम्‌ ।
जाया वि दुनोति राष्ट्रं यत्र प्रापादि शश उल्कुषीमान्‌ ॥ अथर्व-5-17-4
पथ भ्रष्ट, अनुशासनहीन-अनैतिक और अज्ञानी, समाज मे उपेक्षित,वंचित महिलाओं के मैले खुले बाल एक प्रतीक हैं कि वे माताएं बन कर अपनी संतान को ज्ञानवान और अच्छे संस्कार नहीं दे पाएंगी. इस का दुष्प्रभाव एक महान संकट के रूप में समाज पर विनाशकारी बादल या आकाश से गिरने वाली प्रलयंकारी उल्काओं जैसा होता है.
6-ब्रह्मचारी चरति वेविषद्विषः स-देवानां भवत्येकमङ्‌गम्‌ ।
तेन जायामन्वविदद्‌बृहस्पतिः सोमेन नीतां जुह्वं ने देवाः ॥ ऋ 10-109-5 अथर्व 5-17-5
. युवा सुशिक्षित ब्रह्मचारी ही पथभ्रष्ट महिलाओं का उद्धार कर के समाज मे पुन: स्थापित करने की क्षमता रखते है . इस प्रकार युवतियों को, उनकी छिपी मातृशक्ति पुन: मिल सकती है, जैसा परमेश्वर ने आरम्भ मे अपेक्षा की थी .उस रूप में वे मानव जाति के विकास के लिए समाज को अच्छी संतान प्रदान कर सकती हैं.
6-देवा वा एतस्यामवदन्त पूर्वे सप्तऋषयस्तपसे ये निषेदुः ।
भीमा जाया ब्राह्मणस्योपनीता दुर्धां दधाति परमे व्योमन्‌ ॥ ऋ 10-109-4 अथर्व 5-17-6
इस विषय पर वेद सप्तऋषियों की बात कर रहा है . (विश्वामित्र, वशिष्ट, कश्यप, अत्रि, भारद्वाज,जमदग्नि,गौतम) ये सात ऋषि समाज की परिस्थिति पर ध्यान देते थे. आधिभौतिक अर्थ मे , दो आंख, दो कान , दो नसिका छिद्र, एक मुख ये सात मानव शरीर के सप्त ऋषि कहाते हैं. आधुनिक काल मे हमारा मीडिया टेलिविजन,समाचार पत्र, रेडियो समाज की समस्त स्थिति का अवलोकन और जानकारी दे कर सप्त ऋषि के रूप मे समाज मे जागरुकता दे ते हैं. मूल रूप से 'कहा जा सकता है मीडिया' रिपोर्ट, यह व्यक्त करते हैं कि महिलाओं को जो अपहरण या सम्मोहन की शिकार हो कर भटक गयी हैं उन पर क्या क्या अत्याचार हो रहे हैं. महिलाएं समाज किन भारी आपदाओं से कष्ट मे है .इन बातों की जान कारी देना मीडिया का एक दायित्व है, जैसा पूर्वकाल मे सप्त ऋषियों का था.

7- ये गर्भा अवपद्यन्ते जगद्‌ यच्चापलुप्यते। वीरा ये तृह्यन्ते मिथो ब्रह्मजाया हिनस्ति तान्‌॥ अथर्व 5-17-7
कन्या भ्रूण हत्याएं जो समाज मे महिलाओं को नष्ट करती हैं, आगे बड़े पैमाने पर हिंसा का माहौल उत्पन्न करते हैं. समाज मे आपस मे हिंसा लडाइ का वातावरण कन्या भ्रूणा हत्या का ही अभिशाप होता है.
8-उत यत्‌ पतयो दश स्त्रियाः पूर्वे अब्राह्मणाः।
ब्रह्मा चे द्वस्तमग्रहीत्‌ स एव पतिरेकधा ॥ अथर्व-5-17-8
. लेकिन एक पतित महिला जिस का अनेक पुरुषों द्वारा शोषण किया गया हो, वह भी अंत में उचित शादी से एक धार्मिक अच्छे आदमी को स्वीकार हो कर समाज मे अपना दायित्व निभाने के लिए पुन:प्रतिष्ठित हो जाती है,
9.ब्राह्मण एव पतिर्न राजन्यो3 न वैश्यः।
तत्‌ सूर्यः प्रब्रुवन्नेति पञ्चभ्यो मानवेभ्यः ॥ अथर्व 5-17-9

पृथ्वी पर सूर्य के प्रकाश की तरह, इस तथ्य को भी बहुत अच्छी तरह से दुनिया को जानना चाहिए कि सब मनुष्यों को अपनी बुद्धि का सम्पूर्ण विकास करना उचित है. केवल एक उच्च शासनधिकारी, या एक बड़ा योद्धा या जीवन में एक बड़ा धनी बन कर कोई भी पुरुष एक पत्नी को लेकर अच्छा पिता बन कर अच्छे संतान का जनक नही होता.

10-पुनर्वै देवा अददुः पुनर्मनुष्या उत ।
राजानः सत्यं कृण्वाना ब्रह्म जायां पुनर्ददुः ॥
ऋ 10-109-6 अथर्व 5-17-10
किसी भी महिला का अगर अपहरण या शोषण, हुवा हो तो यह राज्य का दायित्व हो जाता है और उसे रक्षा प्रदान करा के समाज में उसका सम्मान के साथ पुनर्वास करे..
11-पुनर्दाय ब्रह्मजाया कृत्वी देवैर्निल्बिषम्‌ ।
ऊर्जं पृथिव्या भक्तवायो रुगायमुपासते ॥
ऋ 10-109-7 अथर्व 5-17-11
ऐसी महिलाओं जो किसी भी अपराध से निर्दोष हैं, और यदि उनके पुनर्वास की जरूरत पैदा होती है तो यह राज्य खर्च से होना चाहिए.

12-नास्य जाया शतवाही कल्याणी तल्पमा शये ।
यस्मिन राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्या ॥ अथर्व 5-17-12
जहां महिलाओं का शोषण होता है, / उनकी मर्जी के खिलाफ मजबूर किया.
वहां के शासक चारों ओर से सुरक्षा बलों से घिरे होने पर भी अपने अंत:वास मे भी अपने सुरक्षित नही पाते.
13-न विकर्णः पृथुशिरास्तस्मिन्वेश्मनि जायते ।
यस्मिन्‌ राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्या ॥ अथर्व 5-17-13
जहां महिलाओं का शोषण होता है, / उनकी मर्जी के खिलाफ मजबूर किया.
उस देश के समाज मे बुद्धिजीवियों की आवाज नही सुनी जाती. अज्ञानियों का विस्तार और बौद्धिक विद्वानों का विकास रुक जाता है,
14-नास्य क्षत्ता निष्कग्रीवः सूनानामेत्यग्रतः ।
यस्मिन्‌ राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्या ॥ अथर्व 5-17-14
जहां महिलाओं का शोषण होता है, / उनकी मर्जी के खिलाफ मजबूर किया.
आभूषणों से (धन धान्य से) सुसज्जित कर्मचारी, शूरवीर क्षत्रिय सैनिक भी अपना दायित्व नही निभाते..
15-नास्य श्वेतः कृष्णकर्णो धुरि युक्तो महीयते ।
यस्मिन्‌ राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्या ॥ अथर्व 5-17-15
जहां महिलाओं का शोषण होता है, / उनकी मर्जी के खिलाफ मजबूर किया.
अश्वमेध यज्ञ के लिए राजा अपने अश्व पर भी नही चढ पाता और उस का अपने पडोसी देशों मे सम्मान नही होता..
16-नास्य क्षेत्रे पुष्करिणी नाण्डीकं जायते बिसम्‌ ।
यस्मिन्‌ राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्या ॥ अथर्व 5-17-16
जहां महिलाओं का शोषण होता है, / उनकी मर्जी के खिलाफ मजबूर किया.
वहां जल निकायों मे कमल के फूल नही खिलते, वनस्पतियों के बीज स्वयं नही अंकुरित होते. पर्यावरण की अवनति होती है.
17-नास्मै पृश्नि वे दुहन्ति ये ऽस्या दोहमुपासते ।
यस्मिन्‌ राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्या ॥ अथर्व 5-17-17
जहां महिलाओं का शोषण होता है, / उनकी मर्जी के खिलाफ मजबूर किया.
गाएं दुधारु नही होती
18-नास्य धेनुः कल्याणी नानड्‌वान्त्सहते धुरम्‌ । विजानिर्यत्र ब्राह्मणो रात्रिं वसति पापया ॥ अथर्व-5-17-18
समाज न ही गाय बैलों से कल्याण ले पाता है ( जैविक कृषि नही प्राप्त होती) और महिलाओं की समाज में सक्रिय भागीदारी के बिना, पुरुष रात्रि मे अपराध करने के लिए मुक्त फिरते हैं.