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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

स्वामी सोम्यानन्द जी के आत्मा-परमात्मा विषयक सिद्धान्त विरुद्ध विचारों की समालोचना

ओ३म्

स्वामी सोम्यानन्द जी के आत्मा-परमात्मा विषयक
सिद्धान्त विरुद्ध विचारों की समालोचना

– भावेश मेरजा

आर्य जगत् के २३-२९ सितम्बर २०१२ के अंक में स्वामी सोम्यानन्द सरस्वती जी का एक लेख प्रकाशित हुआ है, जिसमें महर्षि दयानन्द जी द्वारा प्रतिपादित वैदिक दार्शनिक सिद्धान्तों के विरुद्ध कई भ्रामक व अस्पष्ट बातें लिखीं गईं हैं । जैसे कि –

श्री सोम्यानन्द जी ने अपने लेख के शीर्षक में ही मिथ्या कथन करते हुए लिखा हैं – "वेदानुसार आत्मा और परमात्मा में अंश और अंशी का सम्बन्ध है ।" जबकि वास्तविकता यह है कि वेदानुसार आत्मा (जिसको जीव अथवा जीवात्मा भी कहा जाता है) और परमात्मा में व्याप्य-व्यापक, उपास्य-उपासक, पिता-पुत्र, स्वामी-सेवक आदि का सम्बन्ध है – अंश और अंशी का सम्बन्ध कभी नहीं हो सकता है । महर्षि दयानन्द जी के ग्रन्थों में कहीं पर भी नहीं लिखा गया है कि आत्मा और परमात्मा में अंश और अंशी का सम्बन्ध है । क्या सोम्यानन्द जी महर्षि दयानन्द कृत ग्रन्थों में से कोई ऐसा प्रमाण ढूंढ़कर प्रस्तुत करने की कृपा करेंगे कि जिसमें आत्मा और परमात्मा में अंश और अंशी का सम्बन्ध बताया गया हो ?

वैसे युक्ति से भी आत्मा और परमात्मा में अंश-अंशी का सम्बन्ध सिद्ध नहीं किया जा सकता । क्योंकि अंश कभी नित्य, अनुत्पन्न, अनादि, अविनाशी, शाश्वत, सनातन नहीं हो सकता । अंश कभी न कभी उत्पन्न हुआ होता है । वह सदैव सादि और विनाशी ही होता है । काल के किसी क्षण में जब वह अपने अंशी से पृथक् होता है, तभी उसकी अंश के रूप में सत्ता बनती है । जिसका आरम्भ होता है, उसका अंत होता ही है । अब विचार करें कि वेद एवं समस्त वैदिक ग्रन्थों में तो आत्मा (= जीव अथवा जीवात्मा) को अनादि चेतन सत्ता के रूप में ही वर्णित किया गया है । और चेतन पदार्थ कभी किसी का अंश नहीं हो सकता । अंश सदा अवयवी पदार्थ का होता है । अतः अंश और अंशी का सम्बन्ध केवल और केवल जड़ अथवा प्राकृतिक कार्य पदार्थों में ही सम्भव है । दो चेतन पदार्थों में अंश और अंशी का सम्बन्ध हो ही नहीं सकता । आत्मा को परमात्मा का अंश मानने पर न केवल आत्मा ही को, बल्कि परमात्मा को भी अनित्य और विनाशी मानना पड़ेगा । क्योंकि जिस पदार्थ के अंश होते हैं अर्थात् जो पदार्थ खंड-खंड में विभाजित होता है, अपने को विखण्डित करता है, वह कभी नित्य या अविनाशी हो ही नहीं सकता । महर्षि दयानन्द जी ने सत्य ही लिखा है – "जीव उत्पन्न कभी न हुआ, अनादि है ।" (सत्यार्थ प्रकाश, सप्तम समुल्लास) इसी समुल्लास में आगे महर्षि जी ने जीव को "ब्रह्म से भिन्न, अनादि, अनुत्पन्न और अमृत-स्वरूप" लिखा है । अतः सोम्यानन्द जी का उक्त कथन कभी मान्य नहीं हो सकता । वैदिक धर्म के संन्यासी को वेद तथा युक्ति विरुद्ध बातें नहीं लिखनी चाहिए ।

दूसरी बात – क्योंकि अंश अंशी से ही पृथक् होकर अस्तित्व में आता है, इसलिए उसमें वही सारे गुण विद्यमान होने चाहिए, जो अपने अंशी में होते हैं । जैसे सेव के टुकड़े में अर्थात् सेव के अंश में वही सारे गुण होते हैं, जो अंशी सेव में होते हैं । इसी आधार पर उस टुकड़े को सेव का अंश माना जा सकता है । हमारे शरीर में जो खून होता है, उसके परीक्षण के लिए डाक्टर सारे खून का परीक्षण नहीं करता है, केवल अल्प मात्रा में खून लेकर उसी का परीक्षण करता है । उस अंश मात्र खून के परीक्षण को ही हमारे सारे खून का परीक्षण मान लिया जाता है । अतः अंश और अंशी में गुणों का साधर्म्य होता है – यह बात सर्वसम्मत है । अब आत्मा और परमात्मा में अंश और अंशी का सम्बन्ध है – ऐसा मानने वाले लोग विचार करें कि क्या आत्मा में वही सारे गुण विद्यमान हैं, जो परमात्मा में हैं ? या कुछ वैधर्म्य भी पाया जाता है ? महर्षि दयानन्द जी के निम्न मंतव्य हमें सदैव स्मरण रखने चाहिए –

(१) "जीव और ईश्वर स्वरूप और वैधर्म्य से भिन्न, और व्याप्य-व्यापक और साधर्म्य से अभिन्न हैं ।" (स्वमंतव्यामंतव्य प्रकाश)

(२) "जहां जहां सर्वज्ञादि विशेषण हों, वहीं वहीं परमात्मा और जहां जहां इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख और अल्पज्ञादि विशेषण हों, वहां वहां जीव का ग्रहण होता है ।" (सत्यार्थ प्रकाश, प्रथम समुल्लास)

अपनी मिथ्या कल्पना के समर्थन में सोम्यानन्द जी ने शतपथ ब्राह्मण (बृहदारण्यक उपनिषद् ३.७.२२) का "य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनो..." यह प्रसिद्ध वाक्य उद्धृत किया है । इसी वाक्य की व्याख्या महर्षि जी ने सत्यार्थ प्रकाश के सप्तम समुल्लास में लिखी है, जिसमें उन्होंने 'आत्मा' को जीव का पर्यायवाची शब्द माना है और लिखा है – "जो परमेश्वर आत्मा अर्थात् जीव में स्थित और जीवात्मा से भिन्न है; जिसको मूढ़ जीवात्मा नहीं जानता कि वह परमात्मा मेरे में व्यापक है ।" यहां दयानन्द जी ने आत्मा, जीव और जीवात्मा – ये तीनों शब्द एक ही पदार्थ के लिए प्रयुक्त किये हैं । अन्यत्र भी उनके द्वारा ये शब्द एक ही सत्ता के लिए प्रयुक्त किये गये हैं । जैसे कि –

सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में न्याय दर्शन के "इच्छाद्वेष...." इस सूत्र में सूत्रकार ने 'आत्मा' शब्द का प्रयोग किया है, मगर महर्षि जी ने इस सूत्र की व्याख्या में 'जीवात्मा' शब्द का प्रयोग किया है । फिर अगले वैशेषिक दर्शन के "प्राणापान..." इस सूत्र में इसी द्रव्य के लिए 'आत्मा' शब्द का प्रयोग किया गया है । फिर सप्तम समुल्लास में इन्हीं दो सूत्रों की पुनः व्याख्या की गई है, जिनमें 'जीव' एवं 'जीवात्मा' दोनों शब्दों का प्रयोग महर्षि जी ने एक ही पदार्थ के लिए किया है । इसी प्रकार नवम समुल्लास में मुक्ति के प्रकरण में 'मुक्त जीव', 'मुक्ति में जीवात्मा', 'ईश्वर के स्वरूप में जीवात्मा की स्थिति' आदि शब्दों के किये गये प्रयोग से यही सिद्ध होता है कि महर्षि दयानन्द जी की दृष्टि में जीव और जीवात्मा में कोई भेद नहीं है, एक ही पदार्थ या द्रव्य के नाम हैं, और उसी के लिए वे 'आत्मा' शब्द का प्रयोग भी करते हैं । अतः जीव, जीवात्मा और आत्मा – तीनों में कोई तात्त्विक भेद नहीं है । एक ही वस्तु के ये तीन नाम हैं । मुंडकोपनिषद् (३.१.९) के "एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः" तथा बृहदारण्यक उपनिषद् (४.४.२) में भी 'आत्मा' शब्द का प्रयोग जीव के लिए किया गया है । न्याय दर्शन के भाष्यकार वात्स्यायन मुनि ने ३.२.६२ वें सूत्र के भाष्य में जीव के लिए 'आत्मा' शब्द का प्रयोग किया है । यह भिन्न बात है कि उपनिषद् आदि कई ग्रन्थों में प्रकरण अनुसार कभी कभी 'आत्मा' शब्द परमात्मा के लिए भी प्रयुक्त होता है, जिसकी व्युत्पत्ति आधारित व्याख्या सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम समुल्लास में की गई है ।

अपने लेख में सोम्यानन्द जी ने लिखा है – "जीव में आत्मा परमात्मा का ही व्यापक अंश है ।" यह बड़ा ही भ्रामक कथन है । 'जीव में आत्मा' क्या होता है ? जीव ही आत्मा है, और परमात्मा उसी में व्यापक है । बस, यही सरल वास्तविकता है ।

सोम्यानन्द जी ने आगे लिखा है – "आत्मा और जीव का अनादि सनातन सम्बन्ध है ।" जब आत्मा और जीव एक ही सत्ता के दो नाम हैं, तब दोनों में 'अनादि सनातन सम्बन्ध' क्या हो सकता है ? हां, अगर यहां 'आत्मा' का प्रयोग परमात्मा के लिए किया गया हो तो कथन की संगति ऐसे लगायी जा सकती है कि दोनों में अर्थात् परमात्मा और जीव में व्यापक-व्याप्य आदि का अनादि सनातन सम्बन्ध है । मगर सोम्यानन्द जी का अभिप्राय तो भिन्न ही है ।

सोम्यानन्द जी ने एक और विचित्र बात लिखी है – "जीव में आत्मा (परमात्मा) व्यापक होने से जीव में चेतनता का गुण व्याप्त रहता है ।" क्या सोम्यानन्द जी इतना भी नहीं जानते हैं कि जीव भी एक चेतन अनादि पदार्थ है । वह स्वभाव से ही चेतन है । परमात्मा ने उसे चेतन नहीं बनाया है, परमात्मा ने उसे चेतनता प्रदान नहीं की है । चेतनता जीव का अपना स्वाभाविक गुण है । किसी के द्वारा प्रदान किया गया गुण स्वाभाविक नहीं, बल्कि नैमित्तिक होता है । अतः आपका कथन उचित नहीं है । हां, परमात्मा सर्वत्र विद्यमान होने से उसकी स्वाभाविक चेतनता सर्वत्र विद्यमान है, क्योंकि द्रव्य और उसके स्वाभाविक गुण में समवाय सम्बन्ध होता है ।

सोम्यानन्द जी ने आगे लिखा है – " जीव और आत्मा (परमात्मा) संयुक्त रूप से अनादि हैं, अनन्त हैं ।" यहां 'संयुक्त रूप से' का गलत प्रयोग किया गया है, जो निरर्थक है । वास्तव में जीव और परमात्मा – दोनों अनादि हैं । काल की दृष्टि से दोनों समान रूप से अनन्त और नित्य भी हैं ।

लेखक ने लिखा है – "अंश और अंशी अविभक्त होने के कारण एक ही है ।" यह भी मिथ्या कथन है, क्योंकि अंश अंशी से विभक्त हुए बिना, पृथक् हुए बिना अंश के रूप में आ ही नहीं सकता । परमात्मा अनन्त, अखंडनीय, निरवयव और सर्वव्यापक सत्ता होने से उसके अंश की कल्पना ही निराधार है । उसका तथाकथित अंश अपने सर्वव्यापक अंशी परमात्मा से अपने आप को पृथक् कैसे कर पायेगा ? अंश सर्वव्यापक परमात्मा से अलग होकर जायेगा कहां ? जब अपने आप को परमात्मा से पृथक् ही नहीं कर पायेगा तो फिर अंश बन ही कैसे सकता है ?

सोम्यानन्द जी ने आगे लिखा है – "उपासना जीव परमात्मा की करता है । आत्मा परमात्मा की उपासना नहीं करता ।" क्या टिप्पणी करें ऐसी कल्पित बात पर ? लेखक को ऐसी ऊटपटांग बातें नहीं लिखनी चाहिए थीं । दर्शन शास्त्रों या कम से कम सत्यार्थ प्रकाश से सहायता ली गई होती तो सम्भवतः ऐसी भूलें नहीं होतीं ।

अपने लेख के अंत में सोम्यानन्द जी ने महर्षि दयानन्द के वेद भाष्य के २-३ प्रमाण देकर यह बताने का असफल प्रयास किया है कि आत्मा और परमात्मा में अंश-अंशी का सम्बन्ध है । वास्तव में दयानन्द भाष्य में ऐसी कोई बात ही नहीं है कि जिससे लेखक की कपोल कल्पित बात सिद्ध हो सके ।

आर्य समाज की पत्र-पत्रिकाओं में ऐसी सिद्धान्त विरुद्ध भ्रामक बातें नहीं छपनी चाहिए । सम्पादकों को जागरूक रहने की आवश्यकता है ।