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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Mantra of the day(Vedic thought of the day)

मा वो घ्नन्तं मा शपन्तं प्रति वोचे देवयन्तम।सुम्नैरिद्व आ विवासे॥(ऋ।१।८।४१।८)

भावार्थ:-मनुष्य को योग्य है कि न अपने शत्रु और न मित्र के शत्रु में प्रीति करे,मित्र की रक्षा और विद्वानों को प्रियवाक्य,भोजन-वस्त्र-पान आदि से सेवा करनी चाहिये,क्योंकि मित्ररहित पुरुष सुख की वृद्धि नहीं कर पाता है,इससे विद्वान लोग बहुत से धर्मात्माओं को मित्र करें।

(महर्षि दयानन्द ऋग्वेद भाष्य)