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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Mantra of the day(Vedic thought of the day)

अप त्यं परिपन्थिनं मुषीवाणं हुरश्चितं।दूरमधि स्रुतेरज॥(ऋ।१।८।४२।३)

भावार्थ:-चोर अनेक प्रकार के होते हैं,कोई डाकू,कोई कपट से हरने,कोई मोहित करके दूसरों के पदार्थों को ग्रहण करने,कोई रात में सुरंग लगाकर ग्रहण करने,कोई उत्कोचक अर्थात हाथ से छीन लेना,कोई नाना प्रकार की व्यवहारी दूकानों में बैठ के छल से पदार्थों को हरने,कोई शुल्क अर्थात रिश्वत लेने,कोई भृत्य होकर स्वामी के पदार्थों को हरने,कोई छल कपट से औरों के राज्य को स्वीकार करने,कोई धर्मोपदेश से मनुष्यों को भ्रमाकर गुरु बन शिष्यों के पदार्थों को हरने,कोई प्राड्विवाक अर्थात वकील होकर मनुष्यों को विवाद में फंसाकर पदार्थों को हर लेने और न्यायासन पर बैठ प्रजा से धन लेके अन्याय करने वाले इत्यादि हैं,इन सबको चोर जानो।इनको सब उपायों से निकालकर मनुष्यों को धर्म से राज्य का पालन करना चाहिये।

(महर्षि दयानन्द ऋग्वेद भाष्य)

क्या हम देश में पाखण्डी,भ्रष्टाचारी,चोर,इत्यादियों को राहत प्रदान करके वेदाज्याँ का उल्लंघन करके पाप के भागी बनेंगे?