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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

प्रकृति में सुख है वा नहीं?

कुछ लोगों का यह मानना है कि प्रकृति में कोई सुख नहीं है।वे कहते हैं कि समस्त प्रकृति दु:खमय है।किन्तु उनकी यह धारणा सर्वथा गलत है।यदि प्रकृति में सुख नहीं तो आम खाकर व्यक्ति अच्छा महसूस क्यों करत है?यदि प्रकृति में सुख नहीं है तो व्यक्ति को मुलायम बिस्तर पर लेटना क्यों पसन्द है?यदि प्रकृति में सुख नहीं है तो सुन्दर-सुन्दर बादलों की घटायें देखकर व्यक्ति क्यों आनन्दित होता है?यदि प्रकृति में सुख नहीं है तो इसका साफ-साफ मतलब है कि ईश्वर मूर्ख है और नीच भी है।क्योन्कि एक तो उसने बेकार सी दु:खमयी प्रकृति बनायी और सभी जीवों को इस दु:खमयी प्रकृति में रहने के लिये भेजा।उनकी वैसी धारणा से तो ईश्वर पर ही दोष आता है।

लेकिन प्रकृति में सुख है तभी तो प्राणी कर्म करने में प्रवृत्त होता है।अपने आप को चारों वेदों का विद्वान मानने वाले प्रकृति में दु:ख ही दु:ख मानता है।परन्तु ईश्वर स्वयम प्रकृति से लाभ व आनन्द प्राप्त करने के लिये कहता है और उससे आनन्द प्राप्त करना सिखाता है।आजकल भारत में धार्मिक लोग प्रकृति में सुख न मानकर नये-नये सुख के साधन नहीं बनाते हैं।जिस वजह से इस देश में खाने-पीने की न तो उचित सामग्री है और न ही उनकी गुणवत्ता अच्छी है।लेकिन बाबा लोग अपना पाखण्ड चलाने के लिये अभी भी यह मानते हैं कि प्रकृति में सुख नहीं है।

"जब तक मनुष्य लोग तरह-तरह के विज्यान से युक्त होकर तरह-तरह के पदार्थ बनाके दूसरों का उपकार नहीं करते तब तक कोई भी सुख को प्राप्त नहीं होता है"(वेद की शिक्षा)

बाबा लोग वैसा इसलिये कहते हैं ताकि इस देश के वासी विज्यान युक्त हो उनके छ्ल को न जान लें।बाबा लोग खुद ऐशो आराम से रहते हैं और दूसरों को कठिन जीवन जीने के लिये बाध्य करते हैं।