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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Mantra of the day(Vedic thought of the day)

वधीर्हि दस्युं घनिनं घनेन एकश्चरन्नुपशाकेभिरिन्द्र।धनोरधि विषुणक्ते व्ययन्नयज्वान:सनका:प्रेतिमीत्यु:॥(ऋ।१।७।३३।४)

भावार्थ:जैसे शत्रुओं से रहित तथा सूर्यलोक भी मेघ ने निवृत्त हो जाता है,वैसे ही मनुष्यों को चोर,डाकू वा शत्रुऑं को मार और धनवाले धर्मात्माओं की रक्षा करके शत्रुओं से रहित अवश्य होना चाहिये।

(महर्षि दयानन्द ऋग्वेद भाष्य)