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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

नास्तिकों कभी मुझसे भी बात किया करो न!

नास्तिक वह कहाता है जो कि ईश्वर में विश्वास नहीं रखता है।जो धर्म को नहीं मानता है।आजकल के वैज्यानिक नास्तिकता को बढाने के लिये अभूतपूर्व प्रयास करते हैं।मेरे उनसे कुछ प्रश्न हैं।यदि उनके अत्यन्त तेज दिमाग में उत्तर हो तो देवे।
(१)माननीय वैज्यानिक साहेब जी
पहले ही रोक दिया,कहा:चुप कर,माननीय मत लगा Sir लगा,वैज्यानिक मत लगा scientist लगा।

मैंने पूछा ऐसा क्यों?तो उन्होंने कहा कि माननीय पुराने जमाने की बात है अब तो Sir लगा।मैंने कहा आपका सर तो already लगा हुआ है फिर मैं क्यों लगाऊँ?और क्या आपको साईं बाबा अत्यन्त प्रिय है जो आपको (साईं)टिस्ट कहूँ?

बिचारे वैज्यानिक महोदय क्या उत्तर देते।

फिर मैंने आगे कहा "आप ईश्वर को क्यों नहीं मानते हैं"।

सर ने कहा"चल बे! फालतू की बातों के लिये समय नहीं है मेरे पास"।

फिर मैंने कहा"क्या ईश्वर फालतू की वस्तु है जिसके लिये आपके पास समय नहीं है"?

सर ने कहा "हाँ!ईश्वर फालतू की वस्तु है"।

फिर मैंने कहा "तो फिर आप नास्तिक कैसे?"

सर ने कहा "इसमें अब क्या प्रश्न है?"

फिर मैंने कहा "जब आप उसको वस्तु कहते हो तो इसका मतलब है कि आप उसकी सत्त को स्वीकरते हो"

सर ने कहा"मुझसे अशुद्ध वाक्य बन गया"।

फिर मैंने कहा "यदि आपसे भाषा में ही अशुद्धि हो जाती है तो क्या आपके सिद्धन्तों में कोई कमी क्यों नहीं हो सकती है"।

सर ने कहा "हमारे सिद्धन्तों में अवश्य ही कमीयाँ होंगीं जिसे आने वाले वैज्यानिक खोज लेंगें"

फिर मैंने कहा"तो फिर आपके नास्तिकता के सिद्धान्त में कोई कमी तो होगी ही।तो फिर आप इस नास्तिकता पर इतना बल क्यों देते हैं?"

सर ने कहा "क्योंकि यह मुझे सत्य लगता है"।

फिर मैंने कहा "मुझे आस्तिकता सत्य लगती है"।

सर ने कहा " तो क्या करूँ?"

फिर मैंने कहा "जब दो व्यक्ति एक वस्तु के बारे में परस्पर भिन्न विचार रखते हैं तो इसका मतलब है कि दोनों में से कोई एक तो गलत है"।

सर ने कहा "मेरा मत मुझे सही लगता है"।

फिर मैंने कहा "अन्धे को सब काला दिखायी देता है वैसे ही आपको अपना मत अच्छा लगता है"।

सर ने कहा "तुम मेरा अपमान कर रहे हो"।

फिर मैंने कहा "यह अपमान क्या होता है?"

सर ने कहा "अपमान वह होता है कि जिसमें किसी व्यक्ति की निन्दा की जाती हो"

फिर मैंने कहा "तो क्या फिर आप ऋषियॉं की निन्दा नहीं कर रहे हो?"

सर ने कहा "कर रहा हूँ तो क्या करूं"?

फिर मैंने कहा "मैं आपका कर रहा हूँ तो क्या करूँ"?

सर ने कहा "क्योंकि किसी का अपमान करना बुरी बात है"

फिर मैंने कहा "क्या यह नियम आप पर लागू नहीं होता है?"

सर ने कहा "मरे हुओं की निन्दा करना कोई बुरी बात नहीं है"।

फिर मैंने कहा "मैं तो अभी बालक हूँ।आप ५० साल के हैं।थोडे समय बाद मैं भी आपकी खिल्ली उडाऊँ,क्या यह मुझे शोभा देता है?"

सर ने कहा "नहीं"।

फिर मैंने कहा "यदि मुझे यह शोभा नहीं देता तो क्या यह आप जैसे तेज दिमाग वाले व्यक्ति को शोभा देत है"?

सर ने कहा "अ अ अ अ अ ॥"

फिर मैंने कहा "अत: आपको ऋषियों को बद्नाम करना बन्द कर देना चाहिये।फिर आप ईश्वर को क्यों नहीं स्वीकरते हो?"।

सर ने कहा "मुझे ईश्वर से कोई लेना देना नहीं है"।

फिर मैंने कहा "क्या आपके पिताजी हुए थे।या फिर parthenogenesis से पैदा हुए?"

सर ने कहा "हाँ मेरे पिता जी हुए थे"।

फिर मैंने कहा "क्या जब आप छोटे थे तब आपको अपने पिताजी से कोई लेना-देना नहीं था"?

सर ने कहा "था तो"।

फिर मैंने कहा "जब उनसे था तो बडे पिताजी से क्यों लेना-देना नहीं"।

सर ने कहा "मैं ईश्वर के बारे में अधिक नहीं जानता हूँ"।

फिर मैंने कहा "जब किसी पदार्थ के बारे में पूरा नहीं जानते तो क्या हमें उसके बारे में कुछ कहना चाहिये वा नहीं?"

सर ने कहा "नहीं"

फिर मैंने कहा "यदि नहीं तो फिर आपने ऐसा क्यों कहा?"

सर ने कहा "अलविदा"।

दूसरे नास्तिक से बातचीत:

मैंने पूछा "ईश्वर को क्यों नहीं मानते हो?"

उसने कहा "क्योंकि ईश्वर दिखायी नहीं देता है"।

मैंने पूछा "क्या आपकी सात पीढी अथवा २० पीढी पुरानी माँ दिखायी देती है?"

उसने कहा "नहीं"।

मैंने कहा "तो इसका मतलब है कि आपकी मां थी ही नहीं"

उसने कहा "कैसे"?

मैंने कहा "जब तुम्हारी ७ पीढी पुरानी माँ नहीं थी तो आज की मां कैसे हो सकती है"

उसने कहा "मेरी माँ तो अभी जिन्दा है"।

मैंने कहा "यदि है तो इसका मतलब है कि सात पीढी पुरानी तुम्हारी माँ भी थी"

उसने कहा "हाँ"।

मैंने कहा "जब प्रकृति जो दिखने वाली है वह भी नष्ट होकर दिखायी नहीं देती है तो ईश्वर जो कभी पैदा नहीं होता है तुम्हें आँखों से कैसे दिखायी देगा"?

उसने कहा "अ अ म्म्म्म्ं "

यह नास्तिक मत कम बुद्धि वालों को अच्छा लगता है,किन्तु तीव्र बुद्धि वालों को नहीं लगता है।परन्तु जो भारतीयों की तरह एकदम से जडबुद्धि वाल हो उसे इन प्रश्नॉं से कोई लेना देना ही नहीं होता है।