Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

बीहड़ वन में विचर रहा था सच्चे शिव का मतवाला।

बीहड़ वन में विचर रहा था सच्चे शिव का मतवाला।
छोड़ दिया था टंकारा।।स्थाई।।

सुनी जमाने ना उसकी क्या थी दर्द कहानी।
जानबूझकर हम लोगों न एक न उसकी मानी।
...कांच पीसकार दूध में डाला ऊपर जहर मिला डाला।।1।।

फूट-फूटकर हर एक नस से शीशा बाहर आया।
खिला हुआ था फिर भी चेहरा जरा नहीं मुरझाया।
इच्छा पूर्ण हो तेरी भगवन् तू ही मेरा प्रीतम प्यारा।।2।।

कहा ऋषि से जब भक्तों ने कोई पीछे याद बनायें।
भक्तों की सुनकर के वाणी ऋषिराज मुस्काये।
वही चलाना चाहते हो तुम जिससे चाहते छुटकारा।।3।।

वैदिक रीति से दाह करना देह मेरी जल जाये।
मैं चाहता हूँ राख भी मेरी काम देश के आये।
राख उठा खेतों में डालो ‘प्रेमी’ जाने जग सारा।।4।।

SENDER:
RAJENDRA ARYA
SANGRUR (PUNJAB)
9041342483

दयानन्द तो

दयानन्द तो बीत गये चूँकि एक दिन है सबको मरना।
जो ज्यति देव ने छोडी अब है उसको अपनाना।
ऋषि चरित्र को है जीवन में अपनाना।
पूरे विश्व में से पाखण्ड ढोंग है मिटाना।
सब जगह सत्य को है स्थापित करना।
पूरी विश्व में आर्य संस्कृति स्थापित है करनी।
तब गीत दयानंद के होंगे सच्चे॥

लेखक=विनय आर्य

Your friend
Vinay Arya
Managalpura(vill.),Ladnun(Teh)
Nagaur(Dist.),Rajasthan(State)
India(count.),Continent(Asia)
THE MOTHER EARTH(Planet)