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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वैदिक-विनय अभय ज्योति

वैदिक-विनय अभय ज्योति आचार्य अभयदेव विद्यालंकार

ओ3म्‌ न दक्षिणा वि चिकिते न सव्या न प्राचीनमादित्या नोत पश्चा।

पाक्याचित्‌ वसवो धीर्याचिद्‌ युष्मानीतो अभयं ज्योतिरश्याम्‌ (ऋग्वेद 2.27.11)

ऋषि कूर्मोगार्त्समदो गृत्समदो वा।। देवता आदित्या।। छन्दः विराट्‌ त्रिष्टुप्‌।।

विनय- आजकल मैं एक अँधेरी रात्रि में घिरा हुआ हूँ । मेरे मानसिक नेत्रों के सामने एक ऐसा दुर्भेद्य काला पर्दा आ गया है जिसने कि मेरा सम्पूर्ण प्रकाश रोक लिया है। अपनी वर्तमान आध्यात्मिक समस्या को हल करने में ही मैं दिन रात डूबा हुआ हूँ, कहीं से भी कोई प्रकाश की किरण मिलती नहीं दीखती। चारों तरफ अँधेरा ही अँधेरा है। घोर घुप्प अँधेरा है। दाएँ-बॉंए कहीं कुछ नजर नहीं आता, आगे या पीछे कहीं भी इस अँधकारमय उलझन से बाहर निकलने का रास्ता नहीं सूझता। क्या करूँ? यह भयंकर रात्रि क्या कभी समाप्त भी होगी या नहीं? इस अन्धे जीवन से तो मरना भला है। खाता-पीता, चलता-फिरता हुआ भी मैं आज मुर्दा हूँ। चौबीसों घण्टे विचारने में ग्रस्त हूँ, पागल हो रहा हूँ, प्रकाश पाने के लिए निरन्तर घोर युद्ध में लगा हुआ हूँ, पर इस काली रात्रि का कहीं अन्त होता नहीं दिखाई देता। हे देवो! भगवान्‌ के दिव्य प्रकाश का सन्देश लाने वाले हे उसके "आदित्य' नामक दूतो! मैं तुम्हें याद कर रहा हूँ, तुम्हारी राह देख रहा हूँ। तुम मुझे रात्रि से शीघ्र पार ले चलो, नहीं तो अब मेरा जीना कठिन हो रहा है। सुना है कि बुद्ध, ईसा, दयानन्द आदि अनेक महात्मा अपना दिव्य प्रकाश पाने से पहले ऐसी अँधेरी रात्रियों में से गुजरे थे। पर वे तो जन्म-जमान्तरों के पके हुए थे और बड़े धीर थे। मैं बिलकुल कच्चा, अपरिपक्व ज्ञानवाला और बड़ा दुर्बल, अधीर हूँ। मुझे इससे पार कौन ले जाएगा? किसी तरह भी हो, हे वासक आदित्यो! तुम मुझे भी बसा लो, अन्धकार से निकाल मुझे मरने से बचा लो। मैं चाहे जितना अज्ञानी, कच्चा और धैर्यरहित होऊँ, पर यदि तुम मुझे ले चलोगे, मेरे नायक बन जाओगे तो मैं निःसन्देह अन्धकार को समाप्त कर प्रकाश को पा जाऊँगा और तब इस महाभय से पार हो जाऊँगा। मेरी यह भय की अवस्था उस ज्योति को पाकर ही मिटेगी। मुझे चाहिए वह अभय ज्योति! हॉं, वह अभय ज्योति!!

शब्दार्थ ः- न दक्षिणा विचिकिते=न दायीं तरफ कुछ दिखाई देता है न सव्या=और न बायीं तरफ न=न आदित्याः=हे आदित्यदेवो! प्राचीनम्‌= सामने ही कुछ दिखाई देता है न उत पश्चा=और न कुछ पीछे। इसलिए पाक्याचित्‌=मैं चाहे कितना अपरिपक्व, कच्चा होऊँ और धीर्याचित्‌=चाहे कितना धैर्यरहित दीन होऊँ वसवः=हे वासक आदित्यो! युष्मानीतः=किसी तरह तुम्हारे द्वारा ले जाया गया मैं अभयं ज्योतिः=भय रहित प्रकाश को अश्याम्‌=प्राप्त हो जाऊँ।

Sender:
Rajendra P.Arya
Sangrur (Punjab)
9041342483

वेद-सौरभ-बद

वेद-सौरभ-बद्ध बैल

स्वामी जगदीश्वरानन्द सरस्वती

ओ3म्‌ चत्वारि श़ृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य।

त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्यां आ विवे।।(ऋग्वेद 4.58.3)

शब्दार्थ- एक वृषभ है (अस्य) इसके (चत्वारि श़ृंगाः) चार सींग हैं (त्रयः पादाः) तीन पैर हैं (द्वे शीर्षे) दो सिर हैं और (अस्य) इसके (सप्त हस्तासः) सात हाथ हैं। वह (त्रिधा बद्धः) तीन प्रकार बॅंधा हुआ है। वह (वृषभः) वृषभ (रोरवीति) रोता है। वह (महःदेवः) महादेव (मर्त्यान्‌ आ विवेश) मनुष्यों में प्रविष्ट है।

भावार्थ- पाठक! क्या आपने संसार में ऐसा अद्‌भुत वृषभ=बैल देखा है? यदि नहीं तो आइए, आपको इसके दर्शन कराएँ।

वर्षणशील होने के कारण अथवा पराक्रमी होने के कारण आत्मा ही वृषभ है। मन्त्र में इसी वर्षणशील आत्मा का वर्णन है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इसके चार सींग हैं।

भूत, वर्तमान और भविष्यत्‌ इसके तीन पैर हैं। ज्ञान और प्रयत्न ये दो सिर हैं। पॉंच ज्ञानेन्द्रियॉं, मन और बुद्धि अथवा सप्त प्राण सात हाथ हैं।

सत्व, रज और तमरूपी तीन पाशों से यह बॅंधा हुआ है। इन पाशोें में, बन्धनों में बॅंधा होने के कारण वह रोता और चिल्लाता है। यह महादेव मरणधर्मा शरीरों में प्रविष्ट हुआ करता है। यह आत्मा इस शरीर बन्धन से मुक्त कैसे हो? वेद ने इसके छुटकारे का उपाय भी बता दिया है। वह यह कि मनुष्य अपने स्वरूप को समझे। वह महादेव है, इन्द्रियों का अधिष्ठाता है, स्वामी है। इन्द्रियों के दास न बनकर स्वामी बनो तो त्रिगुणों से त्राण पाकर मोक्ष के अधिकारी बन जाओगे।