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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

दयानन्द की जीत

दयानन्द की जीत हुई इश बात का सबने बेरा था

दिन छुपग्या और शाम हो गई छाया घोर अन्धेरा था

भीड़ उमड़ कर स्वामी जी को चारों तरफ से घेरा था
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ब्रह्मचारी का मस्तक चमके , चन्द्रमा सा चेहरा था

ताली पीट विशुध्दानंद जी हर-हर कर के उठ गये

हार करारी होती देखी सबके गोडे टूट गये

विश्वनाथ और ब्रह्मा, विष्णु शिवशंकर भी रूठ गये

पार बसाई नहीं किसी की भाग नसीबे फूट गये

लोग हजारों मारो-मारो कहकर पत्थर थाये थे

हल्ला - गुल्ला करके उठे कीचड़ धुल बगाये थे

इश घटिया व्यवहार से स्वामी जरा नहीं घबराये थे

सारी इन्द्रि वश में जिसकी योग में जीवन ऊँचा था

काम, क्रोध मोह छू नहीं सकता ब्रह्मचर्य से सुचा था

रघुनाथ प्रसाद दरोगा देखकर आगे आये थे

कपटी और दुष्ट सोर फिर डन्डे मार भगाये थे

स्वामी जी की रक्छा करके बड़े पुण्य का काम किया
देता है इतिहास गवाही अमर जगत में नाम किया

फीके हुये मनोरथ सारे जीत के बदले हार गये

हुलड़ बाजी करते पापी ईट और पत्थर मार गये

खबर छपी सब अखबारों में घर-घर में अख़बार गये

पक्छ्पात करगे राजा भी अपना वक्त विचार गये

मन में सबके बैठ गई थी साधु बहुत अनोखा है

जीत सके ना कोई इससे गडबड झाला धोका है

देखा ना कभी सुना आज तक आज पहला मौका है

सबके मुह बन्द करे ऋषि ने तीर तर्क का ठोका है

Sender:

Rajendra P.Arya
Sangrur -148001 (Punjab)
Mobile: 9041342483