Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

ओम अयन्त

ओम अयन्त इध्म आत्मा जातवेदस्तनेध्यस्ववर्धस्व चेद्धवर्द्धय चास्मान् प्रजया पशुभिब्रहमवर्चसेनान्नाद्देन समेधय स्वाहा ! इदमग्नये जातवेदसे इदन्न मम !! (आश्व. १.१०.११२)

समिधा पाकर यह यज्ञ अग्नि, बढ़कर ऊपर उठ जाता है !
यह अग्नि जगत में हो पर्योग, जीवन संपन्न बनाता है !!
जो अग्नि यज्ञ में आई है
जीवन में वही समाई है !
निर्माण यही जग में करती
इस ने ही आयु बढाई है !
धन धान्य प्रजा पशु तेज कीर्ति, इन सबका अग्नि प्रदाता है !
यह अग्नि जगत में हो प्रयोग, जीवन संपन्न बनाता है !!
यह काष्ठ अग्नि का है शरीर
पा काष्ठ बढ़े यह अग्नि धीर !
मिल जाय अग्नि इस भांति हमें
जिस भांति बने जीवन अमीर !
समिधा की आहुति पाकर के, अति तीव्र अग्नि हो जाता है !
यह अग्नि जगत में हो प्रयोग, जीवन सम्पन्न बनाता है !!
स्वयं दीप्त हमको दमकता
जग में अग्नि प्रकाश लुटाता,
जातवेद इस अग्नि वृद्धि हित
मैं आहुतियाँ आज चढ़ाता !
यह मेरा क्या सब तेरा है, तेरा ही तुझ तक जाता है !
यह अग्नि जगत में हो प्रयोग, जीवन संम्पन्न बनाता है !!

Geetahuti: Pt. Dev naran Bhardwaj

Sender:
Rajendra P.Arya
Sangrur (Punjab)
9041342483