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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Rebuttal of Asampragyata samadhi of vivekanand parivrajak of rojad from Rigvedaadibhashyabhumika

नमस्ते आर्यगण
इस लेख में मैं विवेकानंद परिव्राजक की असम्प्रज्ञात समाधि का खण्डन करूँगा। विवेकानंद मानता है की यदि आप सन्यासी नहीं हैं तो आप वैराग्य को समझते ही नहीं हैं। आपमें कोई वैराग्य नही है। विवेकानंद यह बोलते समय सामने वाले की कोई परवाह नही करता । रोजड़ वाला विवेकानंद यह मानता है की गौतम बुद्ध को हर प्रकार का वैराग्य था। इसका खण्डन--
ऋग्वेदादीभास्यभूमिका के सृष्टि विद्या विषय में लिखा है
-
" रुचं ब्राह्मं जनयन्तो देवाs अग्रे तदब्रुवन् ।
यस्त्वैवं ब्राह्मणो विद्यात् तस्य देवाs असन् वशे ॥
भाष्यम्-- (रुचं ब्राह्मं॰) रुचं प्रीतिकरं ब्राह्मं
ब्रह्मणोंsपत्यमिव
ब्रह्मणः सकाशाज्जातं ज्ञानं जनयन्त उत्पादयन्तो......पश्­
चात तस्यैव
ब्रह्मविदो ब्राह्मणस्य देवा इंद्रियाणि वशे असन
भवन्ति नान्यस्येति
॥21॥
भावार्थ -- जो ब्रह्म का ज्ञान है वही अत्यंत आनंद
करनेवाला और उस मनुष्य
की उसमे रुचि का बढ़ानेवाला है । जिस ज्ञान
को विद्वान लोग अन्य मनुष्यों
के आगे उपदेश करके उनको आनंदित कर देते हैं । जो मनुष्य इस
प्रकार से
ब्रह्म को जानता है , उसी विद्वान के सब मन आदि इंद्रिय
वश में हो जाते
हैं , अन्य के नहीं ॥21॥ "
प्रश्न -- क्या उपरोक्त मंत्र से यह सिद्ध
नहीं होता कि गौतम बुद्ध
वैराग्यवान नहीं था ? महर्षि दयानन्द जी ने विशेष रूप से
"नान्यस्येति "
लिखकर क्या यह उपदेश नहीं दिया है कि केवल और केवल
उन्ही की इंद्रिय संयम
में होती है जिनको ब्रह्म का ज्ञान होता है ? गौतम बुद्ध
विवाहित था
राजकुमार था । कई स्त्रियॉं के बीच रहता था । भोग
करता था । यह बात ठीक
है की उसने घर छोड़ दिया था । लेकिन क्या उसका मन इस
योग्य था की वह उन
स्मृतियों को बिना ब्रह्म के ज्ञान के नष्ट कर सके ? योग
दर्शन में लिखा
है कि -
दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यं॥१५॥
"अनुभव किए हुए और सुने हुए विषयों की तृष्णा से रहित
योगी की मन पर
वशीकरण की अनुभूति (अपर) वैराग्य कहा जाता है । "
स्पष्ट है की गौतम बुद्ध वैराग्यवान नहीं था। विवेकानंद की समाधि schizophrenia है।