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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

साँची में एक कहानी

सुनाऊँ तुमको साँची में एक कहानी|
ध्यान लगा कर सुनो मिलेगी सीख परम सुख-खानी||
सुनाऊँ तुमको साँची में एक कहानी|
आर्य समाजी एक महाशय कन्या जिनकी ज्ञानवती |
गृह कार्यों में दक्ष सुशीला मधुर भाषिणी बुद्धिमती ||
वेद उपनिषद गीता पढ़ती करती संध्या और हवन |
होता था अति शुद्ध सुगन्धित पवन,सुशोभित सकल भवन ||
ब्याही गई किन्तु पौराणिक-घर वह चतुर सयानी |
सुनाऊँ तुमको साँची में एक कहानी||
सास एक दिन देवी के मं...दिर में उसे साथ लाई |
पत्थर मूर्ती समक्ष कड़ी कर बोली यह देवी माई ||
शीश झुका कर श्रद्धा से इसको जो तू भोग लगाएगी |
होगी सकल कामना पूरी मनचाहता वर फल पाएगी ||
पूरण सभी करेगी तेरी इच्छाएं मनमानी |
सुनाऊँ तुमको साँची में एक कहानी||
सुनकर ज्ञानी बहू सास की बातें मन में मुस्काई |
निकट सिंह की मूर्ती बनी थी जिसे देखकर चिल्लाई ||
देखो फाड़ रहा है मुख यह अपना मुझको खाने को |
दौड़ो-दौड़ो दुष्ट सिंह से माता मुझे बचाने को ||
कहकर यूं वह वधु सास से लतिका सी लिप टानी |
सुनाऊँ तुमको साँची में एक कहानी||
बोली सास न डर नाहक तू कहना मेरा मान अरी |
देख ज़रा असली नकली की कुछ तो कर पहचान अरी ||
है यह सिंह निरा पत्थर का बिलकुल है बेजान अरी |
इतना भी तू नहीं जानती क्यों बनती नादान अरी ||
मत घबरा तू कर ना सकेगा कुछ भी यह बहुरानी |
सुनाऊँ तुमको साँची में एक कहानी||
बोली बहू सिंह पत्थर का है यह मुझे न खाएगा |
तुम कहती हो यह नितांत निर्जीव न कुछ कर पाएगा ||
तो पत्थर की देवी भी यह क्या खाएगी हे माता ?
है बेजान न कर सकती कुछ किन्तु एक अचरज आता ||
भोग लगाने की इसको क्यों लोग करें मनमानी |
सुनाऊँ तुमको साँची में एक कहानी||
'न तस्य प्रतिमास्ति' वेद का यह मन्त्र स्पष्ट बताता है |
प्रतिमा उसकी नहीं 'ओ३म् खं ब्रह्म' विशुद्ध विधाता है ||
चर्म चक्षुओं से न देखने में कदापि वह आता है |
किन्तु उपासक मन मंदिर में उसका दर्शन पाता है ||
मृग सैम उसे ढूंढते फिरते इधर उधर अज्ञानी |
सुनाऊँ तुमको साँची में एक कहानी||
बोली सास,बहू तूने मम नेत्र ज्ञान के खोल दिए |
वचन कहे अनमोल कि मानो मानिक मुक्ता तोल दिए||
मूर्ती पूजने अब न जाऊंगी ना तुझको ले जाऊंगी |
पूर्ण "प्रकाश" पुंज परमात्मा को आत्मा में ही पाऊंगी ||
जाऊं आर्य समाज सुनूंगी विमल वेद की वाणी |
सुनाऊँ तुमको साँची में एक कहानी||

Rajendra P.Arya
Sangrur (Punjab)
9041342483