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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

स्वामी दयानंद का बांका वीर सिपाही

(लेखक :- पंडित सत्यपाल पथिक )
मै तो स्वामी दयानंद का बांका वीर सिपाही हूँ |
जिस पर वैदिक लोग चले है मै उस पथ का राही हूँ |
हाथो में बन्दुक वेद की लेकर हर दम चलता हूँ |
मन्त्र गोलियों की बौछाड़े करता हुआ निकलता हूँ |
वहमो और पाखंडो की मै करता चला तबाही हूँ |
जिस पर वैदिक लोग चले है मै उस पथ का राही हूँ |
निन्दा हो या बड़ी प्रशंसा धन आवे या खो जावे |
युगों युगों तक जिऊ मै चाहे या आज ही मृत्यु हो जावे ...|
न्याय के पथ से हटूं कभी न मै ऐसा उत्साही हूँ |
जिस पर वैदिक लोग चले है मै उस पथ का राही हूँ |
नियम सर्व हितकारी में परतंत्र सदा मै रहता हूँ |
हितकारी नियमो में हूँ स्वतन्त्र सभी से कहता हूँ |
सभा के अन्दर कभी न करता मै अपनी मनमानी हूँ |
जिस पर वैदिक लोग चले है मै उस पथ का राही हूँ |
छोटी छोटी बातो पर ही मै न कभी झगड़ता हूँ |
सम्पत्ति सम्मान को पाकर हरगिज नहीं अकड़ता हूँ |
करू “ पथिक “ दोषों से नफरत और गुणों का ग्राही हूँ |
जिस पर वैदिक लोग चले है मै उस पथ का राही हूँ |

Posted By:
Rajendra P.Arya
Sangrur (Punjab)
9041342483

देख बंदे

देख बंदे तेरी है यही बन्दगी , तू किसी जिव को भी सताया न कर |

न किसी पे जरा सी दया कर सके , तो जुलम भी किसी पे तू डाया न कर |

इन पशु पक्षियों को तू मारा न कर , मौत के घाट इन्हें उतारा न कर |

अपनी छः इंच लम्बी जुबाँ के लिए, बेजुबानो पे छुरियां चलाया न कर |

इन बेचारो ने तेरा बिगाड़ा है क्या ? कोई घर बार तोड़ा उजाड़ा है क्या ?

... तू घड़ी दो घडी की लहर के लिए , इन गरीबो के खूँ से नहाया न कर |

निरपराधो को तकलीफ देता है क्यों ? जिन्दगी दे सके न तो लेता है क्यों ?

जग में जीने का इनको भी अधिकार है, बेरहम इनका जीवन मिटाया न कर |

जैसे बच्चे है सब लाडले आप के , ये भी वैसे ही प्यारे है माँ बाप के |

छीन बच्चे किसी के “ पथिक “ मारकर, अपने बच्चो को हरगिज खिलाया न कर

fine peom Your friend Vinay

fine peom

Your friend
Vinay Arya
Managalpura(vill.),Ladnun(Teh)
Nagaur(Dist.),Rajasthan(State)
India(count.),Continent(Asia)
THE MOTHER EARTH(Planet)

ओम् ओम्

ओम् ओम् कौह (पथिक भजनोपहार )
ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह !
छड के कुसंग सत्संग विच बौह !
अपनेंयां पैरां नू संभाल रखना !
माडे पासे जाण न ख़याल रखना !
पानियाँ ने मंजिला ते सिधे राहे पौह !
ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह !......
चंगे चंगे कम हथां नाल करिये !
जेहडा कम करिये कमाल करिये !
हस के मुसीबतां नूं सिर उत्ते सौह !
... ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह......
जग ते बेशक रंग कई वेखणा !
अखियाँ दे नाल सदा सही वेखणा !
कन्नां नूं बुराई तों बचा के रख लौह !
ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह .....
निकी जिन्नी गल दा पहाड़ वेखेया !
बने होए कम्मा दा विगाड़ वेखेया !
एहदे नालों चंगा ए “पथिक” चुप रौह !
ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह.....
(यह भजन श्रद्धेय पथिक जी ने जब संगरूर आर्यसमाज में गाया तो मेरी धर्मपत्नी शांता रानी आर्या को बहुत पसंद आया और गर्भावस्था के दौरान रोज गुनगुनाती थी जिसका प्रभाव ये हुआ की जब मेरा नवजात पुत्र मनीष आर्य रोने लगता तो मेरी धर्मपत्नी गाने लगती “ ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह” तो मनीष रोना बंद कर देता था ! इस चमत्कारिक सूचना के लिए मैंने पथिक जी को पत्र लिखा था ) राजेन्द्र आर्य, संगरूर (पंजाब) ९०४१३४२४८३