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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

परमपिता परमेश्वर

निर्विकार और निराकार प्रभु जग कैसे साकार रचा ।
परम पिता परमेश्वर तूने किस भांति संसार रचा । ।
तारों से भरा नभ का आंगन ,सूरज चन्दा कर रहे गमन ,
घन घोर घटा करती गर्जन ,कहीं शीतल मंद सुगंध पवन ।
यह बिन सीमा का नील गगन ,जिसमें पंछी कर रहे गमन ,
मिल रहा हमें निषदिन भोजन ,हे जगदीश्वर तुम हो धन धन ।
कौन सी शक्ती किस वास्तु से ,सब कुछ सर्वाधार रचा । । परमपिता परमेश्वर .....
कहीं ऊचे पर्वत वन उपवन , कहीं गहरे सागर करें नमन ,
कहीं रेट के टीले औषध अन्न ,कहीं हीरे मोती लाल रतन ।
कहीं काँटों में खिल रहे सुमन , कहीं महक रहा शीतल चन्दन ,
कहीं बोल रहे हैं पक्षीगण ,कहीं भोंरों की प्यारी गुनगुन ।
कहीं डाली में हैं फूल रचे ,कहीं गुल के नीचे खार रचा । । परमपिता परमेश्वर .....
कितने सुन्दर हैं क्या कहना ,इस मस्तक में हैं दो नयना ,
बिन तेल के ही इस दीपक का ,चौबीस घंटे जलाते रहना ।
मुख में दांतों क्या कहना , रसना भी बोल रही बैना ,
जागृत स्वप्न सुषुप्ती में भी , सांसों का चलते रहना ।
गर्भ के भीतर मानव चोला ,बिना किसे औजार रचा । । परमपिता परमेश्वर .....
तू अजर अमर तू सुखराशी ,तू निराकार निर अभिलाषी ,
तेरा सुन्दर रूप बहारों में , दीखता रंगीन नज़ारों में ।
सारंगी के म्रदु तारों में , और लय स्वर की झंकारों में ,
यह जीवन है ' बेमोल 'प्रभू जीवन का उत्तम सार रचा । । परमपिता परमेश्वर .....