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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

शास्त्रार्थ

काशी में सन्यासी पहुंचा वेद डंका दिया बजा !

माघोसिंह के बाग़ में आसन दयानन्द ने लिया लगा !

कातिक बदी दूज का दिन था उन्नीस सौ छब्बीस का साल !

सारे शहर में चर्चा फैली समाचार पहुंचा तत्काल !

काशी के राजा से कह दिया सब पण्डितो को लो बुलवा !

... शास्त्रार्थ में करना चाहता झूठ सच निर्णय हो जा !

जिन्दे मात - पिता की सेवा चारों वेद बताते हैं !

मरने पर जो चले गये मुर्दे ना भोजन खाते हैं !

ईश्वर की ना कोई मूर्ति रंग रूप आकर नही !

जन्म कभी ना लेता है वो कहलाता अवतार नही !

पाप ना कटते गंगा जी में चाहे डूब मरे कोई !

जड़ पूजा से धर्म ना होता कितनी ये पूजा करे कोई!

वेदों की मैं बात मानता ये ईश्वर की वाणी हैं !

ब्राह्मण,छत्री, वैश्य हो शुद्र सबके लिये कल्याणी हैं !

गर में हर गया तो राजन मूर्ति पूजा लूँ अपना !

काशी के पण्डित हारे तो जड़ पूजा को दो छुडवा