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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

तेरी दया-सुगन्धी

सत्ता तुम्हारी भगवन जग में समा रही है ।
तेरी दया-सुगन्धी हर गुल से आ रही है ॥
रवि , चन्द्र और तारे , तूने बनाए सारे ।
इन सब में ज्योति तेरी , इक जगमगा रही है ॥
विस्तृत वसुन्धरा पर सागर बहाये तूने ।
तह जिनकी मोतियों से अब चमचमा रही है ॥
दिन - रात , प्रातः - सन्ध्या - मध्याह्न भी बनाया |
हर ऋतु पलट-पलट कर करतब दिखा रही है ॥
सुन्दर सुगन्धी वाले पुष्पों में रंग तेरा ।
यह ध्यान फूल पत्ती तेरा दिल रही है ॥
हे ब्रह्म विश्व-कर्त्ता ! वर्णन हो तेरा कैसे ।
जल-थल में तेरी महिमा , हे ईश ! छा रही है ॥

Rajendra P.Arya
Sangrur (Punjab)
9041342483