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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

परम ज्योति

न मैं धाम धरती , न धन चाहता हूँ ।
कृपा का तेरी एक कण चाहता हूँ ॥
रटे नाम तेरा , वह चाहूँ में रसना ।
सुनें यश तेरा , वे श्रवण चाहता हूँ ॥
विमल ज्ञान-धारा से मस्तिष्क उर्वर ।
... वह श्रद्धा से भरपूर , मन चाहता हूँ ॥
करें दिव्य दर्शन , तेरा जो निरन्तर ।
वही भाग्यशाली नयन चाहता हूँ ॥
नहीं चाहना है , मुझे स्वर्ग-छवि की ।
मैं केवल तुम्हें , प्राण - धन ! चाहता हूँ ॥
"प्रकाश" आत्मा में , अलौकिक तेरी ही ।
परम ज्योति प्रत्येक क्षण चाहता हूँ ॥

-- पं . प्रकाशचन्द्र कविरत्न

Post:
Rajendra P.Arya
Sangrur (Punjab)
9041342483