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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

पिता की सीख

पिता की सीख

सुते !

लोग कहते है यह शुभ घड़ी है, घड़ी शुभ तो हैं क ष्टदायक बड़ी है

समझता है वह इसको जिसपर पड़ी है, कि माता-पिता को निहायत कड़ी है

जुदा इसमें होता है टुकड़ा जिगर का, हटाना ही पड़ता है दीपक यह घर का

नहीं बेसबब आँसुओं की रवानी, किसी दु:ख की आँसू है ये निशानी

सुता - प्रेम बहने लगा बनके पानी, हुई पानी-पानी मेरी बुध्दिमानी

यह माना की दिल का है अरमान निकला, मगर धैर्य से मोह बलवान निकला

समय है कि कुछ तुझको उपहार दूँ मैं, कोई वस्त्र या कुछ अलक्डार दूँ मैं

मयस्सर जो हो तो रतनहार दूँ मैं, न इक बार ही बल्कि सौ बार दूँ मैं

न दूँगा तो हो जाएगी बात हेटी, तो ले कुछ -न - कुछ तुझको देता हूँ बेटी

न हीरे न मोती न अनमोल मनके, न कलियों की माला न जूडे सुमन के

ऋणी क्यों हों सर्राफ के या चमन के,नहीं अगं - भूषण ये भूषण हैं मन के

अगर यह अलंकार स्वीकार होगा, तो तेरा भी आदर्श श्रृंगार होगा

जो निन्दा करे कोई नारी किसी की ,तो ज़ाहिर न करना कभी राय अपनी

मुनासिब है उस वक्त केवल खमूशी, करेगी वही वर्ना खुद तेरी चुग़ली

तेरे सिर पै आ जाएगी सब बुराई , यूँ घर बैठे तू मोल लेगी लड़ाई

ससुर हों कि भरतार के जयेष्ट भ्राता,जिठानी हों या सास का जिनसे नाता

उन्हें तू समझना पिता और माता, कि सन्तोष हो तुझको हे मेरी जाता

सुता देवरानी है सूत - तुल्य देवर, यही तो है कुलवान कन्या का ज़ेवर

बिगड़ना न बेवास्ता दासियों पर, न बल तोलना अपने चपरासियों पर

दयाभाव रखना भवन-वासियों पर, भरोसा सदा करना विश्वासियों पर

न बन बैठना शहद की मूर्ख मक्खी, कमाई कभी दान की और न चक्खी

यथोचित यथाशक्ति तू दान देना, न उल्टा हो वो, पात्र को देख लेना

रंगे स्यार को दूध फेनी व फेना, मिले वृध्द संन्यासियों को चबेना

न हो जाये इश तरह बद-इन्तजामी, गया माल भी रह गई फिर भी खामी

किसी बात पर डाँट भी दे जिठानी , ख़फा और घरवाले हों नागहानी

हमें गालियाँ दें अगर वृध्द नानी, तो उस वक्त करना यही सावधानी-

पलट कर उन्हें कोई उत्तर न देना, बतगंड़ ज़रा बात को कर न देना

दबेगा न उत्तर से गुस्सा किसी का, करेगा मगर काम जलते पै घी का

नहीं कोई उत्तर खमूशी से नीका, यहाँ ख़त्म है टिप्पणी और टीका

हराती है सौ को अकेली खामूशी, कि है शान्ति की ही सहेली खामूशी

अगर सास ने शब्द कड़वा कहा है, तो इस पर बुरा मानना ही बुरा है

इसे चुप से पीना , इसी में भला है, कि यह वैधरानी की कड़वी दवा है

न तब वह कलहरुप सरसाम होगा, ज़रा देर पीछे खुद आराम होगा

समझ लेंगी जब यूँ समझदार तुझको, करेंगी वो माँ की तरह प्यार तुझको

अगर आ गया उच्य व्यवहार तुझको,बना देंगी घर-भर का मुखतार तुझको

बड़ा मान घर की अदालत करेगी, जिठानी भी तेरी वकालत करेगी

अगर आ गई बोलनी मीठी बोली, सुमन-तुल्य है फिर तमन्चे की गोली

जो घर में बहू - बेटियों की है टोली, समझ ले जो तुझसे मिली तेरी हो ली

वही धन्य है जिसकी वाणी मधुर है, ये कुनबे में सत्कार पाने का गुर है

है कर्त्तव्य तन-मन से स्वामी की सेवा,कि है स्वामी-सेवा का फल मिष्ट मेवा

न गंगा न यमुना न सरयू न रेवा, मगर है यह मन्दाकिनी मुक्ति - देवा

पति को जो पूजेगी उद्दार होगा, इसी घाट तेरा बेड़ा पार होगा

हैं जगदीश से प्रार्थना यह हमारी, सुहागन रहे तू सदा हे दुलारी

कटे शीलव्रत धारकर उम्र सारी, सती गुणवती हो पति को हो प्यारी

बढे दम्पती प्रेम का ज्ञान निशिदिन, रहे दो शरीरों में इक जान निशिदिन

मै 'बेत़ाब ' हूँ कि समय ने रुलाया, तथापि मैं खुश हूँ कि यह वक्त आया

विदा करके तुझको है सन्तोष पाया, कि था मेरी रक्षा में यह धन पराया

हुआ आज वह धन धनी के हवाले, बस अब वह सँभाले कि ईश्वर सँभाले

Rajendra P.Arya
Sangrur (Punjab)
9041342483