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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Yogi ka atmacharitra by Maharshi Dayanand ??????????

Namaste Aryagans
please take time for this important book named "Yogi ka atmacharitra" . it is claimed to be written by Maharshi Dayanand. Actually it says that this is hindi translation of original Sanskrit Autobiography written by Maharshi Dayanand .
to Download this book goto the following link-
http://ved-yog.com/products.php?cat_id=1305540307&par_cat=0

And select Yogi ka atmacharitra. download this Pdf ebook. its around 600 kb only.
i haven't read the whole book yet. but Dayanand(claimed) reveals that Jesus Christ was in India. This book also reveals that Gautam Buddha lived more than 2500 years ago !
Please read this book. And if someone knows exactly who wrote this kindly inform me.
Thanks
Basant Jhariya

*******ओउम्*******

*******ओउम्*******

ओउम् भूर्भुवः स्वः | तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि | धियो यो नः प्रचोदयात् ||

भु स्तुति -‍ हे प्राणप्रिय बहुत प्रेम करने योग्य प्रभु ! आप मुझ आत्मा के अन्दर हो ऐसा मैं अनुभव करके प्रत्यक्ष देख रहा हूँ |

प्रार्थना - हे बहुत प्रेम करने योग्य प्रभु ! आप मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए जिससे मैं आपसे बहुत प्रेम करने लग जाउँ अर्थात् मै उल्टे संस्कारों (आदतों) के वशीभूत होकर न चाहता हुआ भी मन, बुद्धि, इन्द्रियों से उल्टे अर्थात् व्यर्थ, दोषपूर्ण अव्यवस्थित कार्य कर लेता हूँ और अच्छे संस्कारों की न्यूनतावश चाहता हुआ भी मन, बुद्धि, इन्द्रियों से अच्छे अर्थात् आवश्यक, गुणवर्धक, व्यवस्थित कार्य नहीं कर पाता हूँ |

अतः प्रभु ! मुझ आत्मा के अन्दर से उल्टे संस्कारों को समाप्त करके अच्छे संस्कारों को भर दीजिए जिससे प्रभु ! मेरा आपसे बहुत प्रेम हो जाएगा और व्यर्थ, दोषपूर्ण, अव्यवस्थित कार्य करने की प्रवृति दिन-प्रतिदिन घटती ही जाएगी |

उपासना - हे बहुत प्रेम करने योग्य प्रभु ! आपसे बहुत प्रेम करने के लिए मैं पूर्ण पुरुषार्थ करूँगा | अर्थात् अब तक जो हुआ सो हुआ अब जानबूझकर मन बुद्धि, इन्द्रियों से व्यर्थ, दोषपूर्ण और अव्यवस्थित कार्य नहीं करूँगा | ऐसा दृढ़संकल्प लेकर हे प्रभु ! मैं आपके समर्पित हूँ | यदि आलस्य प्रमादवशात् मन, बुद्धि, इन्द्रियों से जानबूझकर कोई दोष कर भी दिया तो उसका प्रायश्‍चित अवश्य करूँगा |

भुवः स्तुति - हे सबके सब जगह सब प्रकार के दुःखों को दूर करने वाले प्रभु ! आप मुझ आत्मा में विद्यमान हैं ऐसा मैं प्रत्यक्ष देख रहा हूँ |

प्रार्थना - हे सबके सब जगह सब प्रकार के दुःखों को दूर करने वाले प्रभु ! आप सब जगह मेरे सब प्रकार के दुःखों को दूर कर दीजिए | हे प्रभु ! मै उल्टे संस्कारों के वशीभूत होकर न चाहता हुआ भी मन, बुद्धि, इन्द्रियों से व्यर्थ, दोषपूर्ण अव्यवस्थित कार्य कर लेता हूँ और अच्छे संस्कारों की न्यूनतावश चाहता हुआ भी मन, बुद्धि, इन्द्रियों से आवश्यक, गुणवर्धक, व्यवस्थित कार्य नहीं कर पाता हूँ | अतः हे प्रभु ! आप मुझ आत्मा के अन्दर से उल्टे संस्कारों को समाप्त करके अच्छे संस्कार भर दीजिए जिससे मैं सब जगह सब प्रकार के दुःखों से दूर हो जाउँ |

उपासना - हे सबके सब दुःखों को दूर करने वाले प्रभु ! आपकी दुःख दूर करने की कृपा को प्राप्त करने के लिए पूर्ण‌ पुरुषार्थ करूँगा | अर्थात् अब तक जो हुआ सो हुआ अब जानबूझकर मन बुद्धि, इन्द्रियों से व्यर्थ, दोषपूर्ण और अव्यवस्थित कार्य नहीं करूँगा | ऐसा दृढ़संकल्प लेकर हे प्रभु ! मैं आपके समर्पित हूँ | यदि आलस्य प्रमादवशात् मन, बुद्धि, इन्द्रियों से जानबूझकर कोई दोष हो भी ग‌या तो उसका प्रायश्‍चित अवश्य करूँगा |