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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

ईश्वर का प्रत्यक्ष सत्यार्थ प्रकाश से

महर्षि दयानंद जी के अनुसार सृष्टि में रचना विशेष लिङ्ग देखकर ईश्वर का प्रत्यक्ष होता है । चलिए देखते हैं की ईश्वर प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है। हम जानते हैं की कारण के विना कार्य्य नहीं होता। अतः इस सृष्टि का निर्माण विना निमित्त कारण परमात्मा के नहीं हो सकता। उपादान कारण प्रकृति है। प्रकृति जड़ है यह चेतन नहीं है। चेतन ज्ञानादि गुण संयुक्त है। प्रकृति ज्ञान रहित है क्योंकि वह जड़ है। जड़ पदार्थ ज्ञान नहीं रखता। हम सृष्टि में देखते हैं की मनुष्य के शरीर का निर्माण अतीव सुन्दर एवं ज्ञानपूर्ण है। इस ब्रह्माण्ड का निर्माण अतीव ज्ञानपूर्ण है। हमें ज्ञानादि गुण प्रत्यक्ष है इससे उस ज्ञान रखने वाले का अर्थात गुणी का प्रत्यक्ष होता है। गुणी का प्रत्यक्ष इन्द्रियों से नहीं होता। केवल गुण का होता है। जैसे सूर्य्य के प्रकाश में हमें पुष्प का प्रत्यक्ष नेत्र इन्द्रिय से हुआ । प्रकाश के अभाव में हमें पुष्प के रंग रूप जो की उसका गुण है, का प्रत्यक्ष नेत्र इन्द्रिय से नही हो सकता। हमें केवल रंग रूप का नेत्र इन्द्रिय से प्रत्यक्ष होता है। गुण का प्रत्यक्ष होता है गुणी का नहीं। अशुद्धात्मा अजितेंद्रिय मनुष्य को यह विज्ञान समझ में नहीं आता इसीलिए उसे ईश्वर प्रत्यक्ष नहीं होता। एक और उदाहरण देता हूँ सरलता के लिए ताकि थोड़ी बुद्धि वाले को भी समझ में आ जाये । मटके का निर्माण कैसे होता है ? मटके को बनाने के लिए चाहिए मिट्टी , मटका बनाने का यन्त्र , समय , आकाश(Space) , एक मटकाकार जो की मटका बनाने का ज्ञान रखता हो , जिसमे ऊर्जा हो इत्यादि (मैं अधिक विस्तार में नहीं जाऊंगा) । इनमे से एक का भी अभाव हो तो मटका नहीं बनेगा। सबसे आवश्यक चेतन कर्त्ता मटकाकर है अन्य तो जड़ है । यह सृष्टि भी एक मटका है इसे चेतन कर्त्ता परमात्मा ने बनाया है । कृपया Aryasamajonline में मेरा नया Article पढ़ें ।