Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

कठोपनिषद् 2 - 23 )

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन |
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् || ( कठोपनिषद् 2 - 23 )

भावार्थ -- परमात्मा बहुत व्याख्यान करने और व्यवस्थायें देने से नहीं मिल सकता , न ही वह केवल बुद्धि से जाना जा सकता है और न ही बहुत से ग्रन्थों के पढने या गुरु से सुनने से इसको कोई जान सकता है । जिसको अधिकारी जानकार परमात्मा उस पर अपने स्वरुप का प्रकाश देता है , उसी को ज्ञान हो सकता है । अर्थात ब्रह्मश्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के उपदेश से ब्रह्मज्ञान हो सकता है । जो लक्ष्य पर पहुँच चुका है , वह आप्त कहलाता है , यदि उसके कहे के अनुसार आचरण किया जाए तो परमात्मा का प्रकाश प्रकट होता है । जब तक परमात्मा अपने स्वरुप का प्रकाश न करे , तब तक कोई उसे नहीं देख सकता । जैसे सूर्य जब तक अपने स्वरुप का प्रकाश नहीं करता , तब तक आँख उसको दूसरे की सहायता से भी नहीं देख सकती । ऐसे ही जीवात्मा परमात्मा को परमात्मा की सहायता से ही देख सकता है । दूसरे की सहायता से उसका जानना असम्भव है ।

-- स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती

Rajendra P.Arya
Sangrur (Punjab)
9041342483