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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

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ओउम
वधु सौभाग्य के साथ ससुराल में प्रवेश करे
डा. अशोक आर्य
प्रत्येक सास, स्वसुर व परिवार की यह कामना होती है कि उनकी बहु सुन्दर हो, सुशील हो , सुखों की परिवार में वर्षा करने वाली हो | इस कामना की पूर्ति के लिए विवाहोपरांत जब नववधू गृह में प्रवेश कर...ती है तो उस परिवार में उसका स्वागत करने वाले तथा उसे आशीर्वाद देने वालों का तांता सा लग जाता है | यह इस लिए कि यह नव वधु इस परिवार को ऊँचा उठाने का कार्य करे , इस वधु के आगमन से यह परिवार स्वर्गिक सुखों से भर जावे , नव वधू के कार्यों से उस की ही नहीं पुरे परिवार की सर्वत्र प्रशंसा हो तथा परिवार में सुख, समृद्धि व एश्वर्य की वर्षा हो | ऋग्वेद १०.८५.३३ तथा अथर्ववेद १४.२.२८ में इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुए कहा गया ई कि : -
सुमंगलीरियं वधु - रिमां समेत पश्यत |
सौभाग्यमस्यै दात्वाया$थास्तं वि परेतन ||
ऋग्वेद १०.८५.३३,अथर्ववेद १४.२.२८ ||
शब्दार्थ : -
(इयं वधु) यह वधु (सुमंगली ) मंगलयुक्त (समेत) सब एकत्र हों (इमां) इसको (पश्यत) देखें ( आस्ययी)इस वधु को (सौभाग्यं ) सौभाग्य का आशीर्वाद (दात्वाय) देकर (अथ) तदन्तर (अस्तम) अपने घर को (वि परेतन) लौट जावें |
भावार्थ : -
इस घर में प्रवेश करने वाली यह वधु सुन्दर व मंगलयुक्त हो | सब लोग आकर इसको देखें | यह सब लोग इस वधु को सौभाग्य का आशीर्वा देकर अपने अपने स्थान को जावें |
सुमंगल ही विवाह का मुख्य महत्त्व है, मुख्य तात्पर्य है, मुख्य प्रयोजन है | विवाह सदा सुमंगल की कामना के साथ किया जाता है | विवाह होने के पश्चात जिस परिवार में सुखों की वर्षा नहीं होती, शान्ति का साम्राज्य नहीं होता, एश्वर्य की प्राप्ति नहीं होती , वह परिवार नरक का दूसरा रूप हो जाता है | इस लिए नव वधु को सुमंगली कहा गया है | भाव यह है कि हे नववधू ! तूं इस परिवार में सुखों की वृद्धि के लिए प्रवेश कर , इस परिवार के धन एश्वर्य को बढाने के लिए प्रवेश कर , तूं इस परिवार में आज्ञाकारी व सुशिक्षित पुत्र - पुत्रियों को बढाने के लिए प्रवेश कर आदि आदि |
विवाह संस्कार की विभिन्न विधियों में से एक विधि सुमंगलीकरण का अत्यधिक महत्त्व है | वधु की मांग में जो सिंदूर वर द्वारा दान किया जाता है, यह स्त्री के सौभाग्यवती होने के प्रतीक स्वरूप किया जाता है | यदि स्त्री की मांग में सिंदूर होता है तो वह सौभाग्यवती जानी जाती है | कोई उस की और आँख उठाने का साहस नहीं करता | सब जानते हैं कि यह स्त्री अपने साथ एक भरा पूरा परिवार रखती है , यदि उस पर किंचित भी बुरी दृष्टि डाली तो विनाश हो जावेगा किन्तु इस सिंदूर से रहित नारी का इस संसार में जीवन ही दूभर हो जाता है | अत: सौभाग्य का यह चिन्ह सिंदूर ही उस का सब कुछ हो जाता है, जो उसे उसके पति द्वारा दिया जाता है |
इस सिंदूर दान के अतिरिक्त भी विवाह के अवसर पर जो अन्य क्रियाएं की जाती हैं , उनमें प्रदक्षिणा, लाजाहोम , सप्तपदी आदि की विधियां होती है किन्तु इन सब विधियों के अंत में ही सिंदूर द्वारा यह सुमंगलीकरण की विधि की जाती है | इस का करण है कि यह वधु अब इस परिवार का अंग हो गयी है | यहाँ आ कर परिवार का मंगल करेगी , कल्याण करेगी , इस परिवार के सुखों को बढाने का कार्य करेगी | इस सब के लिए उसे बड़ों का आशीर्वाद चाहिए | बड़ों के आशीर्वाद से ही उसे साहस मिलेगा, मार्ग - दर्शन मिलेगा | इस मार्गदर्शन से ही वह भविष्य में ऐसे कार्य करेगी, जिस से परिवार को भी सौभाग्य से भर दे | किसी को कुछ भी दान देने के लिए, वह वस्तु अपने पास होना भी आवश्यक है | यदि अपने पास एक पैसा ही नहीं है तो आगंतुक भिखारी को पैसा कैसे दिया जा सकता है ? यदि वधु के पास सुमंगल है ही नहीं तो वह परिवार को सुमंगल से कैसे भरेगी ? इस लिए सर्व प्रथम वधु के सुमंगल की कामना करते हुए बड़े लोग उसे सुमंगलीभव से आशीर्वाद देते हैं | इसके साथ ही उपस्थित जन समूह को भी इस अवसर पर बताया जाता है कि यह वधु अब सौभाग्यवती हो गयी है | एसा बताते हुए उनसे भी आशीर्वाद कि परिवार कामना करता है , वह चाहते हैं कि उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति भी उनके सुखमय भविष्य के लिए प्रभु से प्रार्थना करते हुए उन्हें आशीर्वाद दे |
मानव जीवन में आशीर्वाद का विशेष महत्त्व माना जाता है | मानव के ह्रदयों में जो भाव भरे होते हैं , यह आशीर्वाद उसकी वाचक अभिव्यक्ति के स्वरूप जाना जाता है | यह माना जाता है कि ( माना ही नहीं जाता अपितु यह मानवीय जीवन कि अनुभूति भी है ) साधु - संतों , हितैषियों, हितचिंतकों , वृद्धों अर्थात बड़े लोगों व गुरुजनों आदि के आशीर्वाद में अत्यधिक शक्ति होती है | उनसे प्राप्त आशीर्वचन कार्य कि सिद्धि में सहायक होते हैं | उनसे प्राप्त आशीर्वाद के प्रेरक शब्दों से ही प्रेरक हो हम उत्साहित हो कर कार्य को संपन्न करने में जुट जाते हैं , जी जान से जुट जाते है, अंत में सफलता मिलाती है | नव दम्पति को भी इस आशीर्वाद से अत्यधिक प्रेरणा मिलाती है , अत्यधिक उत्साह मिलता है , इससे उत्साहित हो कर वह अपने कार्य को संपन्न करने में जुट जाते है | इस लिए ही कहा गया है कि बड़े तो बड़े, छोटे छोटे बच्चों को भी जीवन में यह सिखाया जावे कि वह नित्य प्रात: व रात्रि को तो अपने से बड़ों का आशीर्वाद पावें ही दिन में आने वाले बड़े लोगों से भी आशीर्वाद लें | यदि आरम्भ से ही बड़ों से मार्ग दर्शन पाने की परंपरा होगी तो आगे चल कर यह जीवन की महान सफलताओं का कारण बनेगी | इस लिए ही बहु प्रत्येक गृह कार्य करने से पूर्व बड़ों के आशीर्वाद पाने के रूप में सर्व प्रथम अपनी सास का आशीर्वाद पाना नहीं भूलती | यहाँ तक कि आटा , दाल आदि बनाते समय भी सास के पास जा कर कहती है कि माँ जी ! आप एक बार हाथ लगा दीजिये ताकि घर में बरकत बनी रहे | इस से माँ को भी अपनी बहु पर गर्व होता है तथा उसकी झोलियाँ आशीर्वाद से भर देती है |
यह आशीर्वाद का ही बल है कि प्रत्येक नवदम्पति बड़ों का आशीर्वाद पाने की अभिलाषा रखता है | इस आशीर्वाद से ही वह अपना जीवन उच्च बनांते हुए अपने भविष्य को उज्जवल बनाने का प्रयास करते हैं | इस प्रयास के साथ ही साथ वह अपने माता - पिता व अन्य बड़े लोगों कि जो भावनाएं होती है अथवा उनकी जो आकांक्षाएं अपनी संतान से होती हैं , वह पूर्ण करने का प्रयास प्रतिक्षण करते हैं | इस से स्पष्ट है की सौभाग्य बड़ों के आशीर्वाद में छुपा होता है | यदि हम अपने माता - पिता , गुरुजनों व अन्य बड़ों को प्रसन्