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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

देदीप्यमान कर दो

देदीप्यमान कर दो

ओम् उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजाग्रहि त्वमिष्टापूर्तेसं स्रजेथामयं च ! अस्मिन्त्सध्स्थे अध्युत्त्र्स्मिन विश्वेदेवा यजमानश्च सीदत !! यजुर्वेद १५.५४

उठ यज्ञ कुंड से अग्निदेव, हमको देदीप्यमान कर दो !
हे अग्नि प्रदीप्त प्रकाशित हो, यह आत्म उदीयमान कर दो !!
ओ३म् आपकी अनुकम्पा से
यह अग्नि प्रज्वलित हो जाये !
यह हविर्यज्ञ जग सोम यज्ञ
सम्पूर्ति इसी से हो जाये !
दया धर्म उपकार कर्म की, प्रियवर प्रेरणा दान कर दो !
हे अग्नि प्रदीप्त प्रकाशित हो, यह आत्म उदीयमान कर दो !!
सभी उपस्थित आमंत्रित जन,
आसीन वेदी पर हो जाओ !
विद्वान देवजन संदर्शी
सन्मार्ग यज्ञ का दिखलाओ !
व्यवहार मिलन के साथ साथ, अंतर्मन प्रीतिवान कर दो !
हे अग्नि प्रदीप्त प्रकाशित हो, यह् आत्म उदीयमान कर दो !!
जो बैठ वेदी पर यज्ञ किया
वह वेदी बाद भी ध्यान रहे !
हम उठ कर कहीं चले जाएँ
हर जगमग कर्म महांन रहे !
जो किया यहाँ वह यज्ञ अग्नि, जग में शोभायमान कर दो !
हे अग्नि प्रदीप्त प्रकाशित हो, यह आत्म उदीयमान कर दो !!
(गीताहुती – प्रणेता : देवनारायण भरद्वाज )
राजेन्द्र आर्य
संगरूर (पंजाब)
चलभाष: ९०४१३४२४८३