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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अघमर्षण

अघमर्षण
औ३म् ऋतंच सत्यन्चाभीद्धातपसोअध्याजायत !
ततो रात्र्यजायत तत: समुद्रोंअर्णव: !!१!!
समुद्राद्रणवादधि संवत्सरो अजायत !
अहोरात्राणी विदधद्विश्व्स्य मिषतो वशी !!२!!
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वंकल्पयत !
दिवंच पृथवीन्चान्तरिक्षमथो स्व: !!३!!

प्रभु सामर्थ्य सनातन रहता ! सृष्टि प्रलय क्रम जिससे बहता !!
प्रभु की शक्ति तपस के द्वारा ! पहले ऋत का हुआ पसारा !!
ऋक, यजु, साम वेद अथर्वा ! श्रुति के सत्य नियम ऋत सर्वा !!
ऋत के साथ सत्य चल पड़ता ! सत रज तम हो प्रकृति विविधता !!
महाप्रलय की रात्रि विराजे ! अंतरीक्ष-भू- सागर साजे !!
महाजलधि से थल आ जाता ! सकल पदार्थ ईश बनाता !!
अंतरीक्ष पृथ्वी की सत्ता ! प्रकट हुई फिर काल महत्ता !!
क्षण मुहूर्त दिन प्रहर बनाये ! मॉस वर्ष संवत्सर आये !!
विश्ववशी का करतब जागा ! दिवस रात्रि का हुआ विभागा !!
सूर्य चंद्र नक्षत्र उगाए ! पूर्व कल्प की भांति सजाये !!
द्दो अंतरीक्ष भूलोक बनाता ! सृष्टि पूर्ण यों रचता धाता !!
पाप- पुण्य प्रभु सबके लखता ! यथा योग्य फल निर्णय करता !!
सोच ईश विस्तार यह, लख उसका निर्माण !
मनुज तनिक सी लब्धि पर, क्यों करता अभिमान ?
विफल हुआ तो क्या हुआ ? कर प्रभु से संवाद !
शक्तिमान प्रभु शरण से, मिट जाएँ अवसाद !!

(ब्रह्माक्षरी : देव नारायण भारद्वाज )

राजेन्द्र आर्य
संगरूर (पंजाब)
चलभाष: ९०४१३४२४८३