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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

उष: और ऐश्वर्य‌

महे नो अद्य बोधयोष: || ऋ. 5/79/1

हे उष:! (प्रात काल) आज तूं मुझे ऐश्वर्य के लिये जगा ||