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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

अथर्व-प्रभा (काण्ड १२, सूक्त ५, मन्त्र १ से ११)

अथर्व-प्रभा (काण्ड १२, सूक्त ५, मन्त्र १ से ११)

ब्रह्म गाय (वेदवाणी) का पोषक रस

श्रमेण तपसा सृष्टा ब्रह्मणा वितॠतेश्रिता: (१)

श्रम और तपस्या के द्वारा, श्रुति ब्रह्मगाय मिल पाती है !
वेद गिरा का दुग्ध दान कर, पोषक रसपान कर्रति है !!
जहाँ वेदव्रत जीवन चलता, धन वित्त शुद्धता रहती है !
हो सदाचार का साम्राज्य, यह गाय वहीँ पर बसती है !!

सत्येनावृता श्रिया प्रावृता यशसा परिवृता ! (२)

जब श्रुति वाणी आ जाती है, परिधान सत्य का लाती है !
श्रेयपूर्ण श्रुति अलंकार से, धन राज्य सभी ले आती है !!
यह ब्रह्म गाय श्रुतिवाणी ही, सन्मार्ग सदा दिखलाती है !
जो इसका पालन करता है, यह उसकी कीर्ति बढ़ाती ही !!

तानि सर्वाण्यप क्रामन्ति ब्र्हमागवीमाददानस्य
जिनतो ब्र्ह्माणं क्षत्रियस्य (११)

जो ब्राह्मण की श्रुतिवाणी को, हरते अपमानित करते हैं !
वेदाशय का करके अनर्थ, विपरीत आचरण करते है !!
वर वेद प्रवक्ता ब्राह्मण को, यदि शासक कभी सताते हैं !
उनके ऐश्वर्य राज्य शासन, हाथों से हटते जाते हैं !!

(अथर्व-प्रभा : प्रणेता देव नारायण भारद्वाज )

प्रेषक: राजेन्द्र आर्य, संगरूर (पंजाब) चलभाष: ९०४१३४२४८३