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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

वेद मन्त्र:- महे नो........

महे नो अद्य बोधयोषो राये दिवित्मती |
यथा चिन्नो अबोधय सत्यश्रवसि
वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते || ऋ. 5/79/1 || साम : 421 ||

सत्यश्रवसि- जिसमें ठीक ठीक श्रवण होता है वैसी

सुजाते- जिसका जन्म शोभायुक्त है ऐसी

अश्वसूनृते- जिसमें दिव्य शब्द व्याप्य जाता है इस प्रकार की

वाय्ये - विस्तार वाली

उष:- प्रभातवेला

यथाचित् - जिस प्रकार

न:- हमको

अबोधय:- पूर्व जगाती रही है उसी प्रकार

अद्य- अब भी

दिवित्मती- प्रकाश वाली तूं

महे राये- महा धन धान्यादि के लिये

न:- हमको

बोधय- जगा ||

हे उष:! (प्रात काल) आज तूं मुझे ऐश्वर्य के लिये जगा

इसमें ऊषा की प्रशंसा के साथ परमात्मा का यह उपदेश है कि जो लोग उष: काल प्रभात वेला में जागते हैं वे उद्यमी कर्मण्य और धान्याद्यैश्वर्यशाली होते हैं | और जो स्त्री उष: के समान गुण, कर्म, स्वभाव वाली होती है उसके घर में लक्ष्मी निवास करती है | जिस प्रकार उष: काल में जगने से यथार्थ श्रवणादि व्यवहार होता है और उष: काल का जन्म सबको अच्छा लगता है, सब पक्षिगणादि प्यारे शब्द‌ बोलते हैं और उष: सब और फैलकर शोभा बढ़ाती है और सबको प्रकाशित करती है, इसी प्रकार स्त्रियों को भी सद्-गुणाढय होना चाहिये ||