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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

आत्मा की कहानी

कहते हैं 'All is well that ends well' परन्तु जिसका न आदि हो न अन्त तो उसकी कहानी का क्या होगा ? आत्मा की कहानी कुछ ऐसी ही है |आदि से अनन्त तक न आरम्भ, न ही अन्त | तो फिर कैसी है यह कहानी ? यह कहानी है एक चक्र की | चक्र, न जिसका आदि होता है न अन्त | वैसे किसी भी स्थान को आदि मान सकते हैं, तब अन्त भी वही स्थान होगा, परन्तु एक अथवा अनेक चक्र पूरे करने के पश्चात | इसके पश्चात नया चक्र , नयी कहानी | तो आइये इस कहानी को आरम्भ करते हैं | इस जीवन के बच‌पन से अथवा उससे भी पूर्व, जब माता के गर्भ में हमने पदार्पण किया | जब हमने कुछ हलचल आरम्भ की | उस हलचल को ही माता पिता ने जब जाना तो प्रसन्नता अनुभव‌ की | हम बड़े होते गये | हलचल बढ़ती गयी | हम बाहर निकल आये, माता के गर्भ से - एक आघात सा लगा, अचानक परिवर्तन से - हम चिल्लाए | यह चिल्लाना हमारे लिये लाभदायक सिद्ध हुआ, हम स्वस्थ प्राण को ग्रहण करने लग गये | हम अब कुछ आत्म निर्भरता की और बढ़ने लगे | करते करते हम बड़े हो गये | अब हम हलचल करने, करवाने वाले बन गये | न जाने कितनी प्रकार की हलचल कर पाने की क्षमता हमने प्राप्त कर ली | तब धीरे धीरे जीवन समाप्ती की और बढ़ने लगा | हलचल कम होने लगी | हलचल की समाप्ती का भय हमें सताने लगा | परन्तु एक दिन फिर आघात लगा और हम यह शरीर त्याग कर बाहर निकल गए | हलचल करने वाला बाहर निकल गया, तो शरीर को भस्मीभूत कर दिया गया |

हलचल जीवन है तो हलचल करने वाला - जीवनकर्त्ता या जीवन का प्रयोगकर्त्ता | पर कौन है यह जीवन का प्रयोगकर्त्ता ? जीवन भर हम हलचल‌ पर हलचल‌ करते रहे, जाने में अथवा अंजाने में | वास्तव में यही है हमारी उपस्थिती का प्रमाण | हलचल ही आत्मा की और इसी प्रकार परमात्मा की उपस्थिती का प्रमाण देती है |
अब हलचल ही हमारे जीवन की नियती है, तो कैसी हलचल हम करें ? हलचल किसमें और कैसे ? हलचल किसी भी जड़ पदार्थ अथवा चेतन सत्ता में हो सकती है | जड़ वस्तु में हलचल में रहने की क्षमता तो है, पर स्वयं अपनी हलचल में स्वेच्छा से, बिना बाहरी हस्ताक्षेप के परिवर्तन करने की क्षमता नहीं है | आत्मा के लिये यह सुलभ है | परमात्मा स्वयं सर्वव्यापक है अत उसमे स्वयं में हलचल संभव नहीं, लेकिन वह सभी व्याप्त पदार्थों में हलचल करने की क्षमता से परिपूर्ण है | परमात्मा की इसी हलचल करने की क्षमता के परिणाम स्वरूप इस सृष्टि का सृजन हुआ | और उसी के अनन्त गुणो से यह अद्भुत‌ संसार और जीवन प्रगट हुए | उसी सृष्टि का एक कण पाकर जीव भी हलचल करने के योग्य हो गया |

बाल को बैट से मारने की लालसा बालक को बचपन से ही प्रतीत होती है, बस बाल व बैट उपलब्ध होने चाहिए | अब हलचल तो हो पर लाभदायक हो, सुख देने वाली हो | ऐसी न हो कि दुख ही दुख मिलते जायें | ऐसी हलचल जो सृष्टी के रचयिता की सृष्टि रचना के समान सुखों से भरी हो | बस यही है संक्षेप में आत्मा की कहानी, उसका उद्देश्य व सार - सुखों का मिलना और मिलते ही जाना | समाप्त न होना | कभी समाप्त न होना | अब प्रश्न होगा, कैसे बनाएं यह कहानी सुन्दर सुखों से भरी | तो सृष्टि का रचयिता जब उपलब्ध हो, उसे छोड़, विभिन्न उपायों को खोजना एक मूर्खता पूर्ण कार्य ही होगा | अत‌: कहानी को सुंदर बनायें, और इसके लिये लें सहारा प्रभु के नाम का जो सदा सर्वत्र, हर स्थल पर व आपके तन मन में उपलब्ध रहता है, बस आवश्यक्त्ता है उसे स्वच्छ व जागरूक करने की | इसका उपाय है प्रभु की दी दिव्य वाणी का जाप, मनन व चिंतन‌ | वेद वाणी का जाप, परमात्मा के गुणो का जाप - ओउम् का जाप - मानसिक जाप, तन प्राण का जाप और आत्मिक जाप व प्रभु से मिलाप | परमात्मा की विश्व व्यापी सत्ता की उपस्थिती, जिस नाम से मन में पगट हो, बस उसी का जाप, बस उसी का जाप |

ओउम् ! ओउम् ! ओउम् ! ||

''om''

Namaskar,
SwamiDayanand ji started a noble mission and sacrified his life . But now I think Arya Samaj is not working in such speed which is required to fullfill the dreams of Swami ji. Arya Samaj is working but with slow speed and confined to celebrate only few festivals.
I wish Arya Samaj again get much popular in every corner of the Bharat and in the whole world.
please reply and start thinking .
Jai Hind
surjeet sharma (j&k)
seesk85@rediffmail.com