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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

शहीदे आज़म पं० लेखराम जी "आर्य मुसाफिर

महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के दिशा निर्देश के अन्तर्गत हिन्दू जाति की रक्षा के लिए शुद्धि आन्दोलन में सक्रिय भाग लेकर अपना जीवन समर्पित कर दिया ।...
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लिफाफा हाथ में लेकर, दिया जिस वक्त माता ने ।
लगे झट खोलकर पढ़ने, दिया है छोड़ खाने को ॥
लिखा था उसमें कुछ हिन्दू मुसलमां होने वाले हैं ।
तो धोकर हाथ जल्दी से , हुए तैयार जाने को ॥
कहा माता ने "ऐ बेटा ! अभी तो आके बैठा है । "
अभी फिर हो गया तैयार , तू परदेस जा ने को ॥
तू माता और पत्नी को , कुछ ऐसा भूल जाता है ।
नहीं आता महीनों ही , हमें सूरत दिखाने को ॥
यदि सुध बुध हमारी तू , न लेता है , न ले बेटा
" तेरा बेटा लबेदम है, नहीं खाता है खाने को ॥"
मेरा इकलौता बेटा मरता है, तो मरने दे लेकिन ।
मैं जाता सैंकड़ों ही लाल, जाति के बचाने को ॥
सेवक मुसाफ़िर भी सवारी, उस समयलेके आ पहुँचा।
"लो माताजी नमस्ते , मैं हूँ तैयार जाने को ।"
सुबह को तार यह पहुँचा , कि बेटा चल बसा घर से
तो बोले " फिक्र क्या है ? हर इक आता है जाने को
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पुत्र मोह ! जिसने दशरथ को मरते देखा ,
पुत्र मोह ! मानवता की कोमलतम रेखा ।
छोड़ न पाये थे प्रताप भी जिस ममता को ,
लेखराम ! तुम जीत गए उस दुर्बलता को ॥
अन्तिम सन्देश :-
आर्य समाज से तहरीर और तकरीर अर्थात लेखनी और व्याख्यान का काम कभी रुकने न पाये ।