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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

गणपति

गणपति

औ३म नि षु सीद गणपते गणेषु त्वामाहुर्विप्रतमं कविनाम I
न ऋतेत्वतिक्रयते किण्वनारे महामर्कं मघवनियत्रमर्च I ऋ. १०-११२-९

मघवन् प्रज्ञ प्रतीति चाहिए I हमें ओम गण प्रीति चाहिए I

१. गणपति गणेश गणनाथ प्रभो ! गौरव गरिमा गुणनाथ प्रभो !
कवियों में महामनीषी कवि, तुम ओमेश्वर मणि माथ प्रभो !
हमें हृदय अनुभूति चाहिए ! हमें ओम गण प्रीति चाहिए I

२. आओ गणपति यहाँ विराजो, गणमण्डप में गुंजन गाजो !
बिना तुम्हारे काम न संवरें, सत्यम शिवम सुंदरम साजो !
हमें नीति नवनीति चाहिए, हमें ओम गण प्रीति चाहिए I

३. सादर अर्पित हृदय हमारा, अद्भुत प्रिय ऐश्वर्य तुम्हारा !
हमें सफलता सुयश दीजिये, सुभग श्रेष्ठ सामर्थ्य सहारा !
हमें रम्य रणनीति चाहिए, हमें ओम गण प्रीति चाहिए I

(प्रेरक रचना : पं. देव नारायण भारद्वाज )

राजेंद्र आर्य,
३६२-ऐ, गुरु नानक पूरा,
सुनामी गेट, संगरूर-१४८००१ (पंजाब)
चलभाष : 9041342483