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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

एक हाथ की ताली

ताली दो हाथों से बजती है, पर हिन्दू एक हाथ से ताली बजाने की क्षमता रखते हैं |
हिदुओं की सभाओं में हजरत मुह्म्मद साहब, ईसा मसीह आदि महापुरुषों का खूब नाम लिया जाता है | उनके प्रेरणा दायक प्रसगों को कहने में कोई संकोच नहीं किया जाता है | भगवान‌ राम, कृष्ण जैसे महा पुरुषों की श्रेणी में ही उनको डाला जाता है | इससे लाभ उन्हे यह मिलता है, कि उनके द्वारा किसी को रोष करने का मौका, किसी को नहीं दिया जाता |
परन्तु क्या मुसलमान, इसाई भी अपनी सभाओं में हिन्दुओं के महा पुरुषों के नाम लेने में कोई संकोच नहीं करते हैं ? यदि ऐसा है तो यह एक सुखपूर्ण सभ्यता का विकास हो रहा है, ऐसा मानने में कोई शंका नहीं होनी चाहिये | पर क्या ऐसा है ???
सत्य तो यही है कि ऐसा नहीं है | हमें कहा जाता है कि सब अच्छे हैं, पर वे कहते हैं कि केवल वे ही अच्छे हैं | उन्ही के विश्वास अनुसार चलना ही बस एक रास्ता है, अन्य सब गलत है, हीन है, त्याज्य है और नष्ट कर देने योग्य है |

तो फिर ताली कैसे बजे ?
क्या एक हाथ से ही बजाते रहें ??
और हरदम मुँह की खाते रहें ???
कब तक ????