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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

“ईश्वरः जैन एवं वैदिक दृष्टि -डॉ. वेदपाल, मेरठ”

“[वर्ष 2013 में ऋषि – मेले के अवसर पर आयोजित वेद-गोष्ठी में प्रस्तुत एवं पुरस्कृत यह शोध लेख पाठकों के लाभार्थ प्रस्तुत है।] -सपादक%मनुष्य के अस्तित्वकाल से ही उसके विचारणीय महत्त्वपूर्ण विषयों में एक है- ईश्वर। ईश्वर के सबन्ध में कल्पना बाहुल्य उपलध है। जिसका आधार देश, मत – पन्थ तथा धार्मिक विश्वास हैं। इसी कारण उसे अनेक नाम से सबोधित किया गया है। ईश्वर के स्वरूपविषयक कल्पनाएं भी कम मनोरंजक नहीं हैं। शिव के किरात रूप की कल्पना इसका निदर्शन है। इसी प्रकार न कुछ से सब कुछ (अर्थात् अभाव से भाव) करने वाला-मानना (इस्लाम के अनुसार)। सामान्यतः ऐश्वर्य सपन्न, जगत् कर्त्ता, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ तथा जीव के कर्मफल प्रदाता1 के रूप में उसे स्वीकार किया जाता है। एक मत-धर्म ऐसा भी है जो उक्त जगत्कर्तृत्व आदि रूप में तो उसकी सत्ता स्वीकार नहीं करता, किन्तु सर्वज्ञ गुण सपन्न व्यक्ति को ही जिसने अर्थतः और तत्त्वतः आत्मतत्त्व को जान लिया तथा कर्म से विप्रमोक्ष हो गया है उसे सर्वज्ञ2 केवली/ईश्वर कहा गया है। यद्यपि यहाँ यह विशेषण स्मरणीय है कि तत्त्वसूत्र (उमास्वामी विरचित जैनधर्म के प्रमुख दार्शनिक ग्रन्थ) तथा आचार्य कुन्दकुन्द विरचित ‘समयसार’ (जैनमत का प्रमुख आध्यात्मिक ग्रन्थ) में ईश्वर पद का प्रयोग नहीं हुआ है। यह सर्वानुमत है कि संसार में जितने भी कार्य पदार्थ हैं, उनसब का कोई चेतन कर्त्ता है। जैसे-घड़ी, वस्त्र, मोटरकार, कागज, लेखनी आदि पदार्थ किसी न किसी व्यक्ति, सत्ता द्वारा बनाए गये हैं। इनमें से कोई भी पदार्थ ऐसा नहीं है, जिसे किसी ने बनाया न हो और वह स्वयं बन गया हो अथवा अनादि निधन हो। जो पदार्थ जितना व्यवस्थित और बेहतर ढंग से डिजायन किया गया है उसका कर्त्ता उतना ही बुद्धिमान् माना जाता है। इस दृश्य संसार के लिए सृष्टि, जगत् तथा संसार शदों का प्रयोग किया जाता है। सृष्टि शद ‘सृज् विसर्गे’ धातु से निष्पन्न है, जिसका अर्थ है-रची हुई, पैदा हुई। जगत् शद का अर्थ है- ‘गच्छतीतिजगत्’। संसार का अर्थ भी संसरणशील है3 संसार का कोई भी जड़ पदार्थ ऐसा नहीं है, जिसमें स्वतः गति हो अथवा वह संसरणशील हो या स्वयं ही निर्मित हो गया हो। अर्थात् इन पदार्थों का स्वभाव बनना गतिशील होना हो। इनमें बनना या इनका गतिशील होना किसी अन्य बनाने वाले अथवा इन्हें गति देने वाले की अपेक्षा रखते हैं। सृष्टि एवं सृष्टा ईश्वर के विषय में जैन सिद्धान्तों को निम्नवत् समझा जा सकता है- सृष्टि नाम भले ही प्रयोग किया जाए, किन्तु यह सृष्ट नहीं है। अणु-स्कन्ध के स्वाभाविक परिणमन से पुद्गल की उत्पत्ति होती है, किन्तु यह अकृत है। स्वभावतः अनादिनिधना है। अतः स्रष्टा अपेक्षित नहीं। 2. सृष्टि प्रयोजन कर्मफल भोग के सर्न्दा में- कर्म स्वतः फलप्रदाता है और कर्त्ता जीव स्वयं भोक्ता है, इसमें किसी अन्य के हस्तक्षेप का अवकाश नहीं। 3. सृष्ट वस्तु के आधार पर कार्यत्व हेतु- ‘क्षित्यादिकं सकर्तृकं घटवत्’ सयुक्तिक नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार इस जगत् का कर्त्ता इष्ट है, उसी प्रकार ईश्वर कााी कोई कर्त्ता होना चाहिए। इस प्रकार अनवस्था दोष होगा। 4. यदि ईश्वर सृष्टि का स्वभावतः रूचिवशात् या कर्मवशात् कर्त्ता है तो ईश्वर का स्वातन्त्र्य कहाँ? क्योंकि उसे तो उक्त कारणो से चाहे-अनचाहे सृष्टि करनी ही होगी। तब तो वह स्वतन्त्र रहा ही नहीं। 5. जैनमत के संयमप्रधान तपोधर्म होने से ईश्वर के अस्तित्व पर विचार ही नहीं किया गया है अथवा उसकी आवश्यकता ही अनुभव नहीं की गयी, किन्तु जैन मत आध्यात्मिक (आचार्य कुन्दकुन्द प्रणीत समयसार) एवं दार्शनिक (उमास्वामी प्रणीत तत्वार्थसूत्र तथा आचार्य समन्तभद्र प्रणीत आप्तमीमांसा प्रभूति) ग्रन्थों में ईश्वर का निषेध भी उपलध नहीं है। अतः कहा जा सकता है कि- ईश्वरपद ही वहाँ अपराभृष्ट है भले ही आज व्यवहार में जिनेश, जिनेश्वर, जिनभगवान् जैसे शदों का प्रयोग क्यों न किया जाता हो। जैन मत में ईश्वर से मिलती-जुलती अवस्था केवली की है इसे ही सर्वज्ञ कहा गया है। मोह का क्षय होने पर अन्तर्मुहूर्त तक क्षीणकषाय रहकर एक साथ ज्ञानावरण- दर्शनावरण तथा अन्तराय क्षय होने पर केवल ज्ञान प्राप्त होता है।4 वह केवली ही बन्ध हेतुओं (मिथ्यात्व आदि) के अभाव होने तथा तप आदि निर्जरा हेतुओं द्वारा पूर्वोपार्जित कर्मों का विप्रमोक्ष होकर मोक्ष को प्राप्त होता है।5 ऐसा मुक्तात्मा ही सर्वज्ञ पद भाक् है। जैन मत में ईश्वर की चर्चा न होने के सबन्ध में एक अन्य दृष्टिकोण भी ध्यातव्य है, जिसके अनुसार- ईश्वर विषयक अवधारणा का मूल स्रोत वेद है। जैन मत वेदोपनिषद् से पूर्व भारत में प्रचलित मुनिजनों के संयमात्मक तपोधर्म से उदित है।6 अर्थात् उस समय ईश्वर की संकल्पना ही नहीं थी। वैदिक दृष्टि- ईश्वर के सबन्ध में वैदिक दृष्टि सुस्पष्ट है। तदनुसार प्रकृति के परमाणुओं -(जो कि जड़ हैं अतः अक्रिय हैं।) को अव्यक्तावस्था से व्यक्तावस्था में लाने वाली चेतन सत्ता ईश्वर पद वाच्य है। जिस प्रकार लौकिक घट-पट आदि कार्य पदार्थों का उपादान कारण मृत्तिका-तन्तु आदि सर्वस्वीकृत हैं इन कार्य पदार्थों का कर्त्ता-निमित्त कारण कुभकार तन्तुवाय आदि हैं। उसी प्रकार इस कार्य जगत् का उपादान प्रकृति के परमाणु तथा निमित्त कारण ईश्वर है। दृश्यमान जगत्/संसार कार्य है। किसी भी कार्य/पदार्थ के सपन्न हेने में तीन कारण सभव हैं। सर्वप्रथम उसके लिए उसका मूल, जिसके रूपान्तरित होने पर वह वस्तु बनती है। जिस प्रकार पार्थिव घर के लिए मृत्तिका आदि। इसे उपादान कारण कहा जाता है। दूसरा कारण है, जिसके बनाने से कोई वस्तु बने और न बनाने से न बने तथा वह स्वयं रूपान्तरित न हो, अपितु किसी अन्य पदार्थ-उपादान को कुछ बना देवे। जैसे कुभकार मृत्तिका को घट रूप में रूपान्तरित कर देता है। अतः वह उसका निमित्त होने से निमित्त कारण कहा जाता है। तीसरा कारण है- साधारण, जिन साधनों का उपयोग पदार्थ निर्माण में सामान्येन अपेक्षित रहता है वह साधारण होने से साधारण कारण कहलाता है। उपादान के गुण पदार्थ में रहते हैं। संसार में दो ही प्रकार के पदार्थ हैं- 1. चित्-चेतन। 2. अचित्-अचेतन-जड़।7 अचेतन पदार्थ अक्रिय हैं, उनसे स्वतः किसी अन्य पदार्थ का निर्माण नहीं होता अथवा यों कहें कि वह किसी पदार्थ का निर्माण नहीं कर सकते। जैसे- पृथिवी जड़ है, इससे बिना बनाये ईंट, घर आदि पदार्थ कभी नहीं बन सकते। जब कोई चेतन कर्त्ता इच्छापूर्वक प्रयत्न करता है तब उससे ईंट-घर आदि पदार्थ बना लेता है। इसी प्रकार कपास से तन्तु/वस्त्र आदि चेतन कर्त्ता के इच्छा-प्रयत्न से ही बनते हैं। जब यह छोटे से छोटे पदार्थ भी चेतन कर्त्ता के बिना नहीं बनते, तब इतने व्यवस्थित संसार/ब्रह्माण्ड का निर्माण बिना चेतन कर्त्ता के किस प्रकार सभव है। स्कन्ध के स्वतः परिणमन से संसार का निर्माण मानने वाले पार्थिव परमाणुओं (पुद्गल/स्कन्ध) से स्वतः घर का निर्माण क्यों नहीं मानते अथवा बिना कुभकार/ तन्तुवाय के स्वयं बनते हुए घट-पट क्यों नहीं दिखा देते? स्वयं केलिए भवन व वस्त्र क्यों बनाते हैं? अर्थात् सृजन क्रिया के लिए चेतन कर्त्ता अपेक्षित है। संसार में जितनेाी चेतन कर्त्ता हैं, उनका ज्ञान व सामर्थ्य सीमित है। अतः इतना व्यवस्थित नियमबद्ध संसार8 जिसका कर्त्ता सीमित ज्ञान प्रयत्न वाला (मनुष्य) होना सभव नहीं। इसका कर्त्ता निश्चय ही सर्वशक्तिमान व सर्वज्ञ होना चाहिए। उसी का नाम ईश्वर है। यदि ईश्वर के स्थान पर कोई अन्य संज्ञा रखें तब भी संज्ञा उक्त गुणयुक्त ही होगा। अन्य संज्ञा पराी वही प्रश्न सभव है। अतः अन्वर्थ संज्ञा के प्रयोग से कोई हानि नहीं। जगत् कारणता विषय में कार्यकारण सिद्धान्त महत्त्वपूर्ण है, किन्तु जैन दर्शन में इस पर स्पष्ट विचार उपलध नहीं है। केवल जीव द्वारा किए कर्म जिनसे कार्मण वर्गणाएं बनती हैं और वह पुद्गल रूप में रहती हैं, क्योंकि ‘‘कर्म-पुद्गल द्रव्य का पर्याय है….अर्थात् कर्मरूप से परिणत कार्मण वर्गणाओं की सत्ता पौद्गलिक रूप में बनी रहती है9’’। कार्य कारण सिद्धान्त पर जैन की अपेक्षा बोद्धाचार्यों ने अधिक विचार किया है। कल्याण रक्षित (829 ई.) ने ईश्वर भंगकारिका में ईश्वरास्तित्व का निरसन किया है। इनके शिष्य धर्मोत्तराचार्य (847 ई.) ने भी कल्याणरक्षित की परपरा का अपने ग्रन्थों (अपोह नामसिद्धि, क्षणभंगसिद्धि) में पुष्ट किया है। कार्य कारण सिद्धान्त का खण्डन करने वालों ने अग्नि की कारणता के खण्डन (वह्विदाह का कारण है- अन्वय व्यतिरेक….किन्तु अरणि सत्त्वेवह्रिसत्ता…, मणिसत्त्वेवह्रिसन्ता…., तृणसत्त्वेवह्रिसत्ता…. अन्वय तो बनेगा किन्तु व्यतिरेक नहीं। यथाअरण्यभावे वह्रयभावः…., मण्यभावे वह्रयभावः…, तृणभावे बह्रयभावः नहीं….) के द्वारा अन्य सभी प्रकार की कारणता का भी खण्डन किया है। वस्तुतः यह सद् हेतु न होकर हेत्वाभास है, क्योंकि अग्नि दाह के प्रति स्वरूपतः कारण नहीं, अपितु शक्ति मत्त्वेन कारण (शक्तिवाद मीमांसक मत है) है। अर्थात् कारणावच्छेदकता धर्म अरणित्व-मणित्व-तृणत्व न होकर वह्यनुकूलैकशक्तिमत्त्वे सति बह्रिसत्ता-अन्वयः वह्न्यनुकूलैक शक्तिमत्त्वाभावे सति बह्न्यभावः- व्यतिरेकः। इस प्रकार हेत्वाभास का वारण हो जाता है। इसी प्रकार अकस्मात् वाद (पूर्वपक्ष-‘अनिमित्ततो भावोसत्तिः कण्टक तैक्ष्ण्यादिदर्शनात्’ न्याय 4.1.22 प्रत्यायान-‘अनिमित्तनिमित्तत्वान्नानिमित्ततः’, ‘निमित्तानिमित्तयोरर्थान्तर भावादप्रतिषेधः’ 23-24)। का प्रत्यायान न्याय के साथ ही उदयनार्च ने न्याय कुसुमाञ्जलि 1.5 में किया है- हेतुभूतिनिषेध न स्वानुपायविचिर्न च। स्वभाववर्णना नैवमवचेर्नियत त्वतः।। प्रस्तुतकारिका में उदयनाचार्य ने अकस्मात्-अकारणात् की पाँच व्यायाओं 1. कारणं विना भवति 2. कारण व्यतिरिक्ताद्भवति प्रथम के दो अर्थों-क- हेतु का निषेधक ख. उत्पत्ति का निषेधक तथा द्वितीय के तीन अर्थों-वा- स्वस्माद् भवति घ. अलीकाद भवति और स्वभावाद् भवति- इन पाँचों का खण्डन एक ही- अवधेर्नियतत्वतः= ‘नियतकालावधिककार्यदर्शनात्’ द्वारा किया है। कार्यों की स्थिति नियतकाल तक ही दिखाई देती है। कार्य नित्य रहने वाला पदार्थ नहीं है। यह स्थिति तभी बन सकती है, जब कार्यों का कोई कारण माना जाए। 1. यदि उत्पत्ति ही न होती हो या 2. उसका कोई कारण न हो तो उन्हें नित्यपदार्थ के समान होना चाहिए। 3. यदि स्वयं अपने से अथवा 4. अलीक वन्ध्यापुत्र सदृश मिथ्या पदार्थ से अथवा 5. स्वभाव से कार्य (जगत्) की उत्पत्ति मानी जाए तो कार्य के नाश का कोई कारण नहीं बनता। क्योंकि जिन पदार्थों का कारण कोई भाव पदार्थ है। उस कारण के नाश होने से कार्य का नाश हो जाता है। परन्तु स्वस्मात्-अलीकात्-स्वभावात् (…स्वानुपारव्यविधिर्न च। स्वभाववर्णनाा नैवम्…) से उत्पन्न होने की स्थिति में किसके नाश से कार्य का नाश माना जाएगा? इसलिए नाश का सभव न होने से इन तीनों पक्षों में भी कार्य कादाचित्क-अकस्मात्-क्यों है? इसका उपपादन नहीं किया जा सकता है। इसलिए 1. न कार्य के हेतु या कारण का निषेध किया जा सकता है और 2. न उसकी उत्पत्ति या भवन का खण्डन हो सकता है (हेतुभूति निषेधो न) इसलिए अकस्मात् भवति यह कथन करना सर्वथा युक्तिविरुद्ध है। सांयदर्शन में पूर्वपक्ष के रूप में उपन्यस्त ‘ईश्वरासिद्धेः’ 1.92 नास्तिकों का सर्वप्रमुख एवं प्रिय प्रमाण है। जबकि यह सूत्र पूर्व पक्ष है तथा उत्तर पक्ष सांय में ही द्रष्टव्य है, कि उदयनाचार्य ने इस पूर्वपक्ष के समाधानार्थ आठ हेतु उपस्थित किए हैं- कार्यायोजन-घृत्यादेः पदात् प्रत्ययतः श्रुतेः। वाकयात् संया विशेषाच्च साध्यो विधिवदव्ययः।।10 महर्षि दयानन्द सत्यार्थप्रकाश सप्तम समुल्लास में प्रश्नोत्तर के रूप तथा द्वादश समुल्लास में आस्तिक-नास्तिक के संवाद (प्रश्नोत्तर) के माध्यम से जगत् कारण (निमित्त) ईश्वर के स्वरूप को सुव्यक्त कर दिया है। जिज्ञासु वहीं देख सकते हैं। वेद में ईश्वर को ‘अज एकपात्’11 ‘अकायमव्रणम्’12 सर्वज्ञ वेद भुवनानि13, विश्वा साक्षी-‘अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति’14 सृष्टिकर्त्ता- ‘य इदं विश्वं भुवनं जजान’15 ‘हृदयगुहा में दर्शनयोग्य – वेनस्तत्पश्यन्निहितं गुहा यत्’16 अमर्त्य-‘अमर्त्योमर्त्येना सयोनिः’17 आदि विशेषण विशेषित रूप में वर्णित किया गया है। सक्षेप में कहा जा सकता है कि जैन मतानुसार प्रत्यक्ष दृश्य जगत्/सृष्टि अनादिनिधना है। वहाँ न तो ईश्वर की स्थापना है और न ही निषेध । हाँ केवली पुरुष/तीर्थंकर अवश्य सर्वज्ञ कहे गए हैं। व्यावहारिक दृष्टि से विचारने पर स्पष्ट है कि जगत्/ सृष्टि कार्य है। इसका मूल उपादान प्रकृति तथा निमित्त कारण सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ ईश्वर है। नास्तिकों द्वारा कार्यकारण के निषेधक हेतु मात्र हेत्वाभास हैं। वेद में ईश्वर को सर्वज्ञ, न्यायकारी, सृष्टिकर्त्ता, अज, अमर्त्य आदि विशेषण विशेषित कहा गया है।”

Posted by:-

ARYA RAJENDER GABA
SANGRUR(Punjab)

9041342483