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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

माँ’’ – देवेन्द्र कुमार मिश्रा

“भजन, हिन्दी ‘‘माँ’’ – देवेन्द्र कुमार मिश्रा September 29, 2015 Rishwa Arya Leave a comment बस माँ ही है धरती की भगवान बेटों के लिए वरदान। जिसके कारण जीवन में सुगन्ध रहती है। वरना दुर्गन्ध आने लगी रिश्तों से। माँ न होती तो तो पता नहीं दुनियाँ का क्या होता। जब सारे रिश्ते बाजार लगते हैं जब मोह भंग हो जाता है जीने से ही तब वो माँ है जिसे देखकर जीने की इच्छा होती है और भगवान पर भरोसा होता है। क्योंकि उसनें माँ दी है। माँ देकर उसने मरने से बचा लिया। कलयुग के इस चरण में जब भगवान, भक्ति ध्यान-ज्ञान भी बिकता है ऐसे में बस एक ही अनमोल चीज है बच्चों के पास वो है माँ जो जन्म से मरण तक सिर्फ माँ होती है घने वृक्ष की छाँव शीतल जल का स्रोत तेरी गोद में सारे दुखों से मुक्ति माँ तुहारा स्नेह ममता दुलार जन्म-जन्म तक नही चुका सकता माँ शद अपने आप में पूर्ण है। किसी व्याया, विवरण अर्थ की जरुरत नहीं है। माँ बिना संभव ही नहीें हे संसार की समस्त स्त्रियों तुम माता हो संसार की तुहारी चरण वन्दना करता हूँ और जानता हूँ मेरे रोने से मेरे हंसने से तुम क्षमा करके छिपा लोगी अपनी आंचल की छाँव में और तुहारे स्पर्श मात्र से सब दुख दूर हो जायेंगे हे मेरी जननी। मेरी जान न जाने कहाँ-कहाँ भटकी रहती है। लेकिन माँ की जान बेटे में अटकी रहती है। मेरा प्रणाम स्वीकार करो अपनी ममता की छाँव में करो मैं दूर बहुत हूँ तुमसे रोजी-रोटी का चक्कर है लेकिन मैं जानता हूँ मेरी याद में आंँसू बहाती होगी। मेरी सलामती की दुआ माँगती होगी। माँ मैं तो श्रवण कुमार बन नहीं सका लेकिन मैं जानता हूँ तुम माँ ही रहोगी। आरभ से अन्त तक। युग बदले,दुनियाँ बदली जमाना बदला लोगों के चाल-चलन रहन-सहन बदले दिल बदले, व्यवहार बदले। लेकिन नहीं बदली। तो सिर्फ माँ। - पाटनी कॉलोनी, भारत नगर, चन्दनगाँव, छिन्दवाड़ा, म.प्र.-480001”

Posted

Arya Rajender
Sangrur (Punjab)
9041342483