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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

नेतृत्वहीन दिशाहीन आर्यसमाज

“नेतृत्वहीन दिशाहीन आर्यसमाज November 2, 2015 Rishwa Arya 8 Comments महर्षी दयानन्द सरस्वती ने उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में वेदों का भाष्य, सत्यार्थ प्रकाश जैसे कालजयी ग्रंथों की रचना के साथ साथ आर्य समाज की स्थापना करके देश को एक नई दिशा दी. ऋषी के दीवानों ने ऋषी की इस वाटिका को अपने रक्त से सींच कर नई उचाईयों पर पहुँचाया. ऋषी के आकस्मिक निधन की स्तिथी में इन ऋषी भक्तों ने बलिवेदी पर अपने प्राणों को न्योंछावर कर न केवल देश की स्वतन्त्रता संग्राम में अग्रिम भूमिका का निर्वाह किया अपितु सामाजिक सुधारों के लिए देश को जागृत करके इन सामाजिक सुधारों को देशभर में लागू करने के लिए बलिदान देकर एक नई परम्परा का आगाज किया . उस काल में प्रचलित और स्थापित हुए और किसी संगठन में समाज सुधारों के लिए बलिदान देने के एक भी प्रमाण सामने नहीं आते चाहे वो विवेकानन्द द्वारा पोषित रामकृष्ण मिशन हो या ब्रह्म समाज. वह समाज ऋषि दयानन्द की एक दूरगामी सोच का परिणाम था जो न केवल उस समय देश की पराधीनता से मुक्ति व देश की संस्कृति सभ्यता को अपने पुराने गौरव प्रदान करने के लिए संघर्षरत था बल्कि देश में औद्योगीकरण व विदेशों में व्यापार करने एवं इसके लिए विदेशी भाषाओँ को सीखने का भी पक्षधर रहा . वह ऋषी दयानन्द की दूरगामी सोच ही थी जिसने विश्व का ध्यान ऋषी दयानन्द की तरफ खींचा और विश्व भर के अनेकों लोग ऋषी दयानन्द के मुरीद हो गए . यह हमारे लिए दुर्भाग्य का ही विषय रहा की वह नेतृत्वकारी पथ प्रदर्शित करने वाली ज्योती अल्प समय में ही अदृश्य हो गयी. वह भी उस समय में जब संगठन अपनी शैशव अवस्था में ही था . ऋषी दयानन्द के बाद की पीढी ने ऋषी दयानन्द की विचारधारा को न केवल पोषित किया बल्कि इसे अपने रक्त से सींचकर इसे प्रज्वलित रखने और इसको प्रभावी बनाए रखने के हरसंभव प्रयास किये . ऋषी के ये अनुयायियों ने एक के बाद एक इसके लिए प्राणों को न्योंछावर करने की रीति की परिपाटी रख दी जो अपने आप में एक नई परंपरा का निर्माण थी उसी आर्य समाज की स्तिथि आज कितनी दयनीय है. कोई एक सर्वमान्य नेत्रित्व नहीं है. सर्वमान्य संस्था नहीं है. एक कम्युनिस्ट भी आर्य समाज के प्रतिनिधित्व की बात करता हैं, अनैतिक आरोपों से घिरे हुए व्यक्ति भी, वैदिक सिद्धांतों के खिलाफ बोलने वाला भी समाज और संस्था कर प्रधान होता है और शराब पीने वाला भी . आइये ऐसे ही कुछ अन्य बिन्दुओं पर विचार करते हैं : लेकिन उसी ऋषी दयानन्द द्वारा स्थापित आर्य समाज की वर्तमान स्तिथी का क्या ?उसका वर्तमान समय में देश और संस्कृति या किसी और क्षेत्र में क्या योगदान है? देश और संस्कृति के उत्थान के लिए वह किस योजना पर कार्य कर रहा है यह किसे विदित है ? आर्य समाज के किस समाज सुधार को देश के मुखपत्रों पर जगह मिली ? आज स्तिथी यह है कि लोग स्वामी दयानन्द को नहीं स्वामी विवेकानन्द को अधिक जानते हैं . आर्य समाजों में ऋषी दयानन्द के साथ साथ मांस भक्षक वेद निंदक स्वामी विवेकानन्द के चित्र लगे हुए हैं . ऋषी के सच्चे भक्तों के ये वाक्य कटु लगें लेकिन सत्यता यही है. आर्य समाज की अग्रिम संस्था होने का दावा करने वाली संस्थाओं के मंच से स्वामी दयानन्द के निर्वाण दिवस पर मुख्य अतिथी जनरल वी के सिंह स्वामी विवेकानन्द के ऊपर व्याख्यान देकर निकल जाते हैं और श्रोता तालियाँ बजाते हैं और मंच संचालक और अन्य समाजियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती. किसी के खून में ये सुन कर उबाल नहीं आता की स्वामी दयानन्द का इस देश के लिए योगदान विवेकानन्द के बाद आता है .ऐसा प्रतीत हुआ वहां लोगों की रगों में खून नहीं पानी दौड़ रहा था . किसी में इतनी हिम्मत भी नहीं हुयी कि वक्ता की बात का शालीनता से प्रतिउत्तर तो दे सकें . आर्य समाज के कभी ऐसे भी दुर्बल प्रतिनिधि होंगे शायद ही किसी ने सोचा हो. आर्य समाजों के इतिहास भी पुस्तकों में हवस के पोषक ओशो नास्तिक दलाई लामा के विचारों को स्थान मिलने लगा है और वो भी आर्य समाज के मंत्री आदि की प्रेरणा से लिखी जाती हैं और उन्हीं हो समर्पित की जाती हैं. आर्य समाज के मन्दिर आज शादी कराने के अड्डे बन चुके हैं जहाँ ५००० रूपए आदि लेकर किसी की भी शादी कर दी जाती है चाहे वो आर्य समाज की विचार धारा से परिचित हो या न हो .इन्टरनेट पर आर्यसमाज खोजने पर आर्य समाज मैरिज ही लिखा सबसे पहले दिखाई देता है . मात्र २ ३ घंटे में शादी का प्रमाण पत्र देने वाले अनेकों विज्ञापन दिखाई देते हैं या यही ऋषी का सपनों का आर्य समाज है. बिग बॉस -९ की प्रतिभागी मंदाना करीमी की शादी कर प्रमाण पत्र ही इन ऋषी भक्त होने के दम्भ भरने वाली आर्य समाज साकेत नामक संस्था से प्रकाशित हुयी हैं. “कुछ दुष्ट लोगों द्वारा ये धंधा किये जाने का नाम लेकर” इस मुद्दे से हाथ झाड़ने वाले संस्थाओं के अधिकारी क्या यह बताएँगे की आर्य समाज साकेत जहाँ से यह सर्टिफिकेट जारी हुआ क्या उन्ही फर्जी संस्थाओं की सूची में शामिल है . यह सर्टिफिकेट पर डॉ. डबास के हस्थाक्षर हैं जिन्होंने आर्य समाज साकेत का इतिहास विनय आर्य की प्रेरणा से लिखा और उन्ही को समर्पित किया . यह वही पुस्तक है जिसमें ऋषी की सूक्तियों के स्थान पर ओशो और नास्तिक दलाई लामा की सूक्तियाँ दी गयी हैं . ये लोग जरा बताएं तो सही की आर्य समाज में की जा रही इन शादियों का आधार क्या होता है . ऋषी दयानन्द द्वारा बताये गए विवाहों के प्रकारों में से किस प्रकार के विवाह कराने में ये आर्य संस्थाएं संलग्न हैं . आर्य समाज के मंचों पर नर्तकियों द्वारा फ़िल्मी गानों पर नाच: जिस आर्य समाज के मंचों से वैदिक गान गुंजा करता था जहाँ वेद मन्त्रों की व्याख्याएँ और शाश्त्रार्थ हुआ करते थे उन्ही आर्य समाज के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में आज आर्य समाज के वर्तमान विद्वानों और तथाकथित नेत्रित्व्य की उपस्तिथी में नर्तकियों द्वारा “पीतल की तोरी गागरी और श्याम रंग बोमरो आदि गानों पर थिरकना आर्य समाज के पतन के साक्षात उदाहरण हैं. नैतिक पतन : किसी प्रभावशाली नेतृत्व के अभाव का ही परिणाम है की आज इस संगठन के कई लोगों पर चारित्रिक हनन के मुकदमें चल रहे हैं. किन्चित जेल की हवा खा चुके और कुछ खा रहे हैं . कहाँ गया वह ऋषी द्वारा प्रतिपादित ब्रह्मचर्य का सिद्धांत और स्वामी स्वतान्त्रतानंद जी, स्वामी दर्शानानानंद जी जैसे ऋषी के परम भक्त जिन्होंने ऋषी के सिद्धांतों पर चलते ही अपनी जीवन की हवि दे दी. गुरुकुलों और विद्वानों की दयनीय हालात : आजादी के इतने वर्षों बाद आज हालात ये है की ऋषी दयानन्द की पद्धिति को सरकारी माध्यम में प्रचलित करवाने के बजाय स्वयं आर्य समाज के गुरुकुलों ने सीबीएसई आदि के पाठ्यक्रमों को अपनाना आरम्भ कर दिया . ऋषी दयानन्द की शिक्षा पद्धिति से अध्यन अध्यापन करवाने वाले गुरुकुलों के संख्या २ अंकों में भी नहीं. क्या यही वो पद्धिती है जिससे हम विश्व को आर्य बनायेंगे . जिस गुरुकुल की स्थापना के लिए स्वामी श्रद्धानन्द जी ने अपनी संपत्ति और जीवन कुर्बान कर दिया उस गुरुकुल की हालत आज सर्व विदित है. आर्य समाज के विद्वान की हालत किसी पौराणिक अध् पढ़े पुजारी से भी गई गुज़री है . वह ऋषि दयानन्द का अनुयायी अपने निर्वाह के लिए दर दर की ठोकरें खाता है उसे जीवन निर्वाह के लिए वह पौरानिकों के यहाँ पर पौराणिक कर्मकाण्ड कराने के लिए विवश है या उस वर्ग की कृपा का पात्र बनने के लिए निर्भर होना पढता है जिसे ऋषी के सिद्धांत भी नहीं पता. आज देश में ऐसे गुरुकुलों का अभाव है जो क्षत्रियों का निर्माण करते हों जो कर्मकारों का निर्माण करते हो जो व्यवसायियों का निर्माण करते हों . समाज की व्यवस्था चारों वर्णों के अधीन है क्या अन्य वर्गों का निर्माण करने के लिए कोई व्यवस्था की गयी ? खाली पड़े समाज : आर्य समाज के नीरस होने के प्रत्यक्ष प्रमाण उसके खाली पढ़े भवन हैं . जिनमें रविवार के दिन कुछ वृध्द लोग दिख जाते हैं जो जीवन के अंतिम पढाव में हैं . पौराणिक पण्डित अपने मन्दिर में मूर्ति के पास बैठा मिल जाता है लेकिन आर्य समाज मन्दिर में जाने पर अधिकतर या तो ताले लगे मिलते हैं या फिर संचालक/पुरोहित मन्दिर में अपने कमरे में. आर्य समाज के भवनों पर ताले, उन पर किये गए कब्जे और दान के पैसे का उन मुकदमों पर खर्च सर्व विदित है . काश इन नेताओं ने विद्वानों का निर्माण किया होता जो अपने जीवन को आर्य सिद्धांतों के प्रचार प्रसार में लगाते. विधर्मियों को पुरजोर जवाब देने की परम्परा: ऋषि दयानन्द के नाम पर करोड़ों का दान डकारने वाली संस्थाएं आज धर्म पर होने वाले आक्षेपों का जवाब देने तक में अपनी रूचि नहीं रखतीं. ऋषी दयानन्द के नाम पर भवनों का निर्माण और दान इकठ्ठा करना ही इनका परम ध्येय है लेकिन जिस वैदिक धर्म के लिए महर्षि दयानन्द ने अपने प्राणों का त्याग कर दिया उसी ऋषी दयानन्द और उसके वैदिक धर्म पर आक्षेप होने पर ऋषी दयानन्द के नाम पर ये दान इकट्ठे करने वाले और ऋषि भक्त होने का दावा करने वाले उनके ये अनुचर पता नहीं किन बिलों में चुप जाते हैं पता नहीं कौनसा सांप इन्हें सूंघ जाता है . इनकी नाक के नीचे जब ऋषी दयानन्द पर आक्षेप होते हैं ऋषी दयानन्द पर आक्षेप करती हुयी पुस्तकों का प्रकाशन होता है लेकिन इन आर्य समाजी नेताओं के काना पर जूं तक नहीं रेगती . सम्पूर्ण आर्य जगत में केवल ऋषी दयानन्द की स्थानापन्न परोपकारिणी सभा ही इस परंपरा को जिन्दा रखे हुए हैं . उनका यह कदम अत्यंत ही सराहनीय है . कभी भी किसी भी पुस्तक, पत्रिका या किसी भी मंच से वैदिक धर्म या ऋषी दयानन्द पर आक्षेप हो तो ऋषी द्वारा स्थापित ये संस्था जवाब देने में कभी पीछे नहीं रहती . चाहे खुशवन्त सिंह द्वारा धर्म पर आक्षेप हो या जनरल वी के सिंह द्वारा ऋषी के योगदान को कम आंकने की कोशिश या हिंदी साहित्य अकादमी द्वारा ऋषी दयानन्द पर आक्षेप यही एक संस्था है जो आक्षेपों का न केवल जवाब देती है अपितु यह भी सुनिश्चित करती है कि वो जवाब आक्षेप करने वाले तक पहुंचे . कुकुरमुत्ते की तरह उगते तथाकथित विद्वान और आर्य समाजी हदीसों की रचना : आर्य समाज में पुरोहितों/विद्वानों की दयनीय स्तिथी का एक कारण कुकुरमुत्ते की तरह उगते स्वघोषित विद्वान भी हैं. जो कार्य विद्वानों को करने चाहिए वो कार्य में ये स्वघोषित अपनी दक्षता प्रदर्शित कर न केवल पुरोहितों /विद्वानों के कार्यक्षेत्र में हस्तक्षेप करते हैं, उनकी आजीविका के माध्यम पर चोट करते हैं अपितु वैदिक सिद्धांतों के खिलाफ भी बोलते हैं. पण्डित राम चन्द्र देहलवी ,शाश्त्रार्थ महारथी शांती प्रकाश जी ने जीवन लगा कर वह योग्यता प्राप्त की थीं लेकिन ये बिना परिश्रम किये वह चाहते हैं> यही कारण है की विधर्मियों से वार्तालाप में इनके ईश्वर को अनुमान भी हो जाता है. इन स्वघोषितों की पत्नी माता पौराणिक तीर्थों की यात्रा में जाती हैं और ये विश्व को आर्य बनाने और शाश्त्रार्थ महारथी बनने का दम्भ भरते हैं. आर्य समाज में इन अध् कचरे विद्वानों की वजह से अनेक हदीसों की रचना होने लगी है जो ऋषी के भक्तों जिनको तथ्यों का ज्ञान नहीं होता है बड़ी आसानी से प्रचारित हो जाती है. यथा मंगल पांडे का ऋषी दयानन्द का भक्त होना, खुदी राम बोस के फांसी से पहले सत्यार्थ प्रकाश के दर्शन, सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर तांगे वाले के आर्य समाजी बनाना हो या लाठियां खाने के समय लाला लाजपत राय के हाथों में सत्यार्थ प्रकाश का होना हो ये हदीसें इन तथाकथित स्वघोषित विद्वानों की ही देन हैं जो समाज की जड़ों में मट्ठा डालने का कार्य कर रहे हैं अवैदिक कार्यों का आर्य समाज में प्रचलन जिन कार्यों का आर्य समाजी विद्वान विरोध करते हुए चले आये आज उन्हीं अवैदिक कर्मों को आर्य समाज में स्थान मिलने लगा है. चाहे वह एक आर्य संस्था के प्रधान द्वारा कौशाम्बी आर्य समाज के कार्यकर्म में करवा चौथ को वैदिक सिध्ध करना हो या सर्व मनोंकामना पूर्ण करने जैसे कार्यक्रम करना या फिर समाजों में बलि प्रथा के सांकेतिक प्रचलन के तहत यज्ञ की समाप्ति पर गोले को काट कर उसमें मखाने आदि भर उसके मुहं को बंद कर हवि के रूप में डालना. ऋषी दयानन्द और वैदिक धर्म के अनुयायियों को चाहिए की समाज की वर्तमान स्तिथी और समाज के गौरवशाली अतीत का अवलोकन करें . आवश्यकता है कि पतन की वर्तमान स्तिथी का अध्ययन कर इससे उबरने के प्रयासों का निर्धारण कर समयबद्ध तरीके से उनको पूर्ण किया जाये. उन संस्थाओं को चिन्हित किया जाये जो ऋषि के सपनों के समाज और सिध्धातों का पालन करती हैं और उनके नेत्रित्व में अपने गौरवशाली अतीत के स्तर को प्राप्त कर ऋषी के कार्य को आगे बढ़ाने के मार्ग पर प्रशस्त किया जाये .”