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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Re: big bang mystery : arya samaj's views are anticipated

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(एक विचार)
वैज्ञानिकों द्वारा किए जा रहे इस प्रयोग का एक आधार भूत विचार यह दिया गया है कि " प्रलय समय में सारा द्रव्य शक्ति में परिवर्तित हो जाता है, शक्ति के अलावा कुछ शेष नही बचता है और इसी प्रकार सृष्टि की संरचना के समय सारी शक्ति फिर से द्रव्य में परिवर्तित हो जाती है | देखना यह है कि क्या यह सही विचार है ?

केवल मात्र शक्ति, बाकी कुछ भी नहीं ? कैसा लगता है यह विचार ? वैज्ञानिकों की शक्ति की परिभाषा भी केवल गर्मी, प्रकाश, ध्वनि आदि तक ही सीमित है | ऐसे में यह कल्पना की जा सकती है कि प्रलय के पश्चात केवल गर्मी, रोशनी और शोर आदि के सिवा कुछ नहीं था ? अब इससे यह प्रश्न उठना स्वभाविक है कि क्या गर्मी, रोशनी व ध्वनि बिना किसी द्रव्य के विद्यमान रह सकते हैं ? गर्मी इलेक्ट्रान की ही गति विशेष का नाम है | रौशनी भी यदि केवल तरंगें ही मान ली जाए तो भी उन तरंगो को आकाष रूपी माध्यम अथवा आधार तो चाहिए ही, अन्यथा तरंगे किसमें अथवा किस आधार पर अपना कार्य करेंगी | इसी प्रकार ध्वनि तरंगो को माध्यम की आवष्यक्ता है | इन उपर्युक्त बातों पर विचार करने से पता चलता है कि जिसे वैज्ञानिक शक्ति मान रहे र्हैं वह तो द्र्व्य के आधार पर ही अश्रित है |इस प्रकार से तो उपरोक्त कथन त्रुटिपूर्ण लगता है | अब आगे देखें, क्या इस प्रलयं के फलस्वरूप जो शक्ति उपलब्ध‌ हुई उससे सृष्टि का पुन‌र्निर्माण संभव है ? शायद नहीं | क्योंकि जब तक साम्यावस्था नहीं प्राप्त‌ होगी नया चक्र कैसे आरम्भ होगा ?
आइए अब वैदिक आधार की और निहारें | वैदिक मत के अनुसार प्रकृति सत्, तम् और् रज्, इन तीन मूलभूत कणो से बनी है | प्रलय अवस्था में ये सम अवस्था में रहते हैं जो एक अव्यक्त अवस्था है | परमात्मा की ईक्षण शक्ति द्वारा जब इनमें विक्षेप पैदा किया जाता है तो यह क्रमश: महतत्व ,अहंकार‌, पंच तन्मात्रा, दशेन्द्रिय तथा मन (सूक्ष्मभूत‌) और आकाश, वायु,अग्नि, जल , पृथिवी (स्थूलभूत) के रूप में प्रक‌ट होती है | इस प्रकार हम देखते हैं कि सृष्टि की रचना में प्रकृति रूपी द्रव्य तथा परमात्मा की ईक्षण शक्ति का प्रयोग होता है |
इस प्रकार वैज्ञानिकों का आधार ठोस प्रतीत नहीं होता | यदि यह गलत हो तो कैसे सृष्टि निर्माण के प्रयोग में सफलता की आषा की जा सकती है ?
मुश्किल है कि आज के वैज्ञानिकों ने कभी अपने अन्दर झाँक कर भी तो नहीं देखा | हमारे भीतर आत्म शक्ति से ही सारे कार्य प्रेरित होते हैं | यह आत्मा की इच्छा शक्ति ही है जो मन ,बुद्धि को प्रेरणा द्वारा गति प्रदान करती है, न कि भौतिक शक्ति | यदि आपको यह मानने में कठिनाई हो रही हो तो प्रयोग कर देखिए |जब इच्छा शक्ति का किसी भी कारण से ह्रास हो जाता है तो शरीर की सारी की सारी शक्ति बेकार हो जाती है |
अब वेदान्तियों की विचारधारा जिसको वे इन वैज्ञानिको की विचारधारा के अनुकूल मानते हैं, इसको भी उपरोक्त तथ्यों के आधार पर तोला जा सकता है |