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सृष्टि की रचना और सृष्टि का उपभोग‌ | Aryasamaj
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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सृष्टि की रचना और सृष्टि का उपभोग‌

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(वैदिक मान्यताओं पर आधारित एक‌ विचार)

सृष्टी‌ क्या है ? यह जानने से पहले हम यह जानें कि हम क्या हैं ? तन; प्राण; मन; बुद्धि; चित्त अथवा अहंकार अथवा आत्मा या परमात्मा | यह आठ वस्तुएं इस शरीर में विद्यमान हैं | इनमें से तन, प्राण, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार ये जड़ पदार्थ हैं, अर्थात इनमें चेतन शक्ति नहीं है |ये इसी प्रकार हैं ,जैसे कि कमप्यूटर | ये मूल प्रकृति से बने अवयव हैं | इसके पश्चात आत्मा है, जो एक चेतन शक्ति है | अपनी चेतना के कारण यह विभिन्न कार्यों को अंजाम देती है | इस शरीर के मिलते ही वह इसके प्रयोग में संलग्न हो जाती है, और जब तक यह शरीर चलने लायक रहता है, इसे चलाती रहती है | अपनी शक्ति से आत्मा शरीर के सभी अंगो को नियंत्रित करती है, व्यवस्थित करती है, अथवा मन चाहे तरीके से उसे चलाती है |
परमात्मा दिव्य शक्ति है जो सर्वव्यापक होने से सारे विश्व को बनाती है |सृष्टि को बनाने के लिए परमात्मा, प्रकृति का उपयोग करता है | सृष्टि का इस प्रकार वह उत्पादक, नियंत्रक, व्यवस्थापक एवं संहारक है |

अब प्रकृति क्या है ? प्रकृति, सत् ,तम् ,रज् के मूल तत्वों से बनी है | इनकी सम अवस्था में यह अव्यक्त अवस्था में रहती है | परमात्मा की चेतन शक्ति जब इसको अपनी प्रेरणा से स्पंदित करती है तो यह विविध रूप, रस, गंध, स्पर्ष एवं ध्वनि युक्त्त एक सुन्दर स्रृष्टि में बदल जाती है |

अब बारी है आत्मा की | आत्मा भी इसी बनी हुई सृष्टि के एक अंश अर्थात अपने शरीर में अपनी इच्छा शक्ति से स्पंदन पैदा करती है, जिससे मन में विभिन्न प्रकार की गतियों का संचार होता है अथवा उसकी गतियों मे परिवर्तन पैदा होता है | जिससे शरीर विभिन्न प्रकार के कार्य‌ करने लगता है |मन में आत्मा की शक्ति का संचार शब्द वाणो द्वारा होता है | यदि शब्द न हों तो कोई गति व परिवर्तन भी न होगा और इसलिए कोई कार्य भी न होगा | अत: कार्य के लिए शब्द की आवष्यक्ता है | मन में जब शब्द गूँजता है तो शरीर के बाकी भागों में यथा प्राण, बुद्धि, इन्द्रियों में, गति का प्रदुर्भाव होता है जो विभिन्न कार्यों के रूप में परिणित होता है | अत: यदि आप सूक्षमता से विचारे तो पाएंगे कि सृष्टी में प्रत्येक कार्य का आरम्भ शब्द से ही होता है | कह सकते हैं कि शब्द वाण ही सब कार्यों का प्रारम्भिक कारण है |अब यदि मन में बेधा गया शब्द वाण ज्ञान युक्त है,तो इससे मनोवांञ्छित फल को पाया जा सकता है |

अब इसी विचार को आगे बढ़ाएं तो पाएँगे कि परमात्मा से भी सृष्टि का आरम्भ, परमात्मा द्वारा प्रेरित, प्रकृति में पैदा अनन्त तरंगों से हुआ | इन्ही तरंगों से महतत्व, अहंकार,पंच तन्मात्राएं, मन, इन्द्रिय, पाँच भूत आदि के रूप में सृष्टि का निर्माण हुआ | इन सभी अनन्त तरंगों को मिला दिया जाए तो जो स‍युक्त तरंग बनती है,शायद‌ वही है ओउम् की तरंग ! यह सृष्टि निर्माता है, इसी लिए परमात्मा को ओउम् शब्द से पुकारा जाता है | ओउम् रूपी शब्द वाण का यदि हम प्रयोग करते है तो शरीर, प्राण्, मन्, बुद्धि, चित्त, अहंकार में अद्भुत परिवर्तन ला सकते हैं | इसका जितना ज्ञान पूर्वक प्रयोग होगा, उतना ही लाभ होगा, लेकिन‌ बिना ज्ञान के भी इसका उच्चारण लाभप्रद होगा, चूँकि इसका उच्चारण शक्ति का जनक है, जबकि अन्य किसी भी शब्द‌ का उच्चारण शक्ति का व्यय करता है | यह‌ आप प्रयोग‌ कर देख सकते हैं | शरीर के जिस जिस भाग में ध्यान कर इसका जप किया जाएगा, वह उतरोत्तर उन्नति करता जाएगा |

अब इसी प्रकार परम पिता परमात्मा ने श्रुति के रूप में अनन्त ज्ञान से युक्त शब्दवाण रूपी वैदिक मन्त्रों का खजाना मनुष्य मात्र को दिया है | बस आप इन शब्दवाणो का वाचिक, मानसिक, और बौद्धिक जाप करें और अपने तन , मन, बुद्धि में उतरोत्तर सुख की वृद्धि करते जाएँ | प्राणायाम मन्त्र का पाठ हो अथवा गायत्री मन्त्र अथवा अन्य कोई भी मन्त्र उसके जप से निकली तरंगें अद्भुत परिवर्तन लाने की क्षमता युक्त हैं | बस करके देखें इनका प्रयोग |