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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

सभापति के गुण‌ - सत्यार्थ प्रकाश (षष्टसमुलासः)

सभापति के गुण कैसे होने चाहिये -
वह‌ समेश राजा इन्द्र अर्थात विद्युत के समान शीघ्र ऐश्वर्यकर्त्ता, वायु के समान सबके प्राणवत् प्रिय और ह्रृदय की बात जाननेहारा, यम पक्षपातरहित न्यायाधीश के समान वर्त्तने वाला, सूर्य्य के समान न्याय धर्म विद्या का प्रकाशक अन्धकार अर्थात अविद्या अन्याय का निरोधक, अग्नि के समान दुष्टों को भस्म करने वाला, वरुण अर्थात बांधने वाले के सद्दृश दुष्टों को अनेक प्रकार से बांध‌ने वाला, चन्द्र के तुल्य श्रेष्ठ पुरुषों को आनन्ददाता, धनाध्यक्ष के समान कोशों का पूर्ण करने वाला सभापति होवे ||1||

जो सूर्यवत् प्रतापी सबके बाहर और भीतर मनों को अपने तेज से तपानेहारा, जिसको पृथिवी में करड़ी द्दृष्टी से देखने में किसी को समर्थ न हो ||2||

और जो अपने प्रभाव से अग्नि, वायु, सूर्य्य, सोम, धर्मप्रकाशक, धनवर्धक, दुष्टों का बन्धनकर्त्ता, बड़े ऐश्वर्य वाला होवे, वही सभाध्यक्ष समेश होने के योग्य होवे ||3||