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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

Pakhan (Radha) Swami

|| आपको राधा स्वामी कहुँ या फिर पाखण्ड स्वामी... आप भी जाने पाखण्ड स्वामियों का पाखण्ड...!!!

नमस्ते मित्रों !

मित्रों आज हम आपसे राधा स्वामी नामक गुरुडम की चर्चा करने जा रहे हैं इस लेख द्वारा हम आपको राधा स्वामी पाखण्ड का परिचय पूर्ण प्रमाणिकता के साथ करवाएगें और भविष्य में इनके भ्रममूलक दर्शन का परिचय करवाने का प्रयास करेगें |

इस मत् वालो का मान्ना है कि "राधा स्वामी" परमात्मा का निज नाम हैं परन्तु किन्ही भी वेद और वेदानुकूल शास्त्रों में राधा स्वामी नाम परमात्मा का कभी भी दृष्टिगोचर नहीं होता |

वास्तव में राधा स्वामी गुरूडम के संस्थापक श्री शिव दयाल सिहँ जी गुरूद्वारा माईथान आगरा में गुरबाणी से कथा और सतसंग किया करते थे | इनके श्रध्दालु इन्हें "स्वामी" की पदवी से सम्बोधित करते थे और स्वामी शिवदयाल जी की पत्नि का नाम "राधा" था | शिवदयाल जी के 'स्वामी' और उनकी पत्नि के 'राधा' नामो से संयुक्त होकर 'राधा स्वामी' नाम बना |

इस प्रकार के गुरूडम द्वारा ये लोग भोले भाले लोगों को भ्रमित कर अपने ही नाम की स्तुति करवा रहे हैं |

राधा स्वामी गुरूडम वालो ने जहाँ अपने चेलो के लिए माँस शराब आदि वर्जित की है (जो ठीक हैं |) वही उनके लिए हुक्का बीड़ी आदि धुम्रपान पर कोई पाबन्दी नहीं हैं बल्कि स्वयं राधा स्वामी गुरू के द्वारा धुम्रपान करने के प्रमाण इनके ग्रन्थ "सार बचन पृ० ७७९" से मिलते हैं जिसमे लिखा है...

"हुका भर के दासी लिआई | राधा स्वामी ढिग बैठ पिलाई ||"

"फिर भोजन कर बीड़ी खाई | बाँटी बीड़ी कनहीआ भाई ||"

राधा स्वामी गुरूडम में "नाम दान" के नाम पर भी बड़ा पाखण्ड फैलाया जाता है | ये लोग अपने शिष्यों को "गुप्त नाम" देते हैं साथ ही ये सर्त रखी जाती है कि वो गुप्त नाम किसी को न बताया जाएँ अन्यथा बताने वाले को पाप लगेगा |

मित्रों यदि ये बात सत्य है कि बताने वाले को पाप लगेगा तो सबसे पहले तो उन गुरू को लगना चाहिए जो ये गुप्त नाम दान अपने शिष्यों को करते हैं और उससे पूर्व उनके गुरू को जिन्होनें उस गुरू को किया हैं | (अगले लेख में हम आपको वो गुप्त नाम बताएगें |)

मित्रों जहाँ सभी सभ्य पुरूष जूठा खाने और खिलाने दोनों को ही अनुचित मानते हैं और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी ये रोग संक्रमण का कारण हो सकता हैं वहीं राधा स्वामियों के ग्रन्थ जूठन खिलाने का समर्थन करते हैं...

"रोजाना गुरू के पैरों का धोबन पीना व गुरू की झूँठन सभी चेलो को खानी चाहिए |" (यथार्थप्रकाश भाग १ न० ३५ पृ० ११२)

"गुरू के चरणों को धोकर पीवें |" (वही पुस्तक पृ० ११९)

अभी का तो पता नहीं परन्तु पहले राधा स्वामी गुरूडम में एक प्रथा थी कि गुरू के सामने वह प्रसाद जो सतसंग के बाद बाटा जाता था वो थाली में रख दिया जाता था | गुरूजी सभी में से थोड़ा प्रसाद लेकर खाते थे | खूब चबा लेने के बाद उसे प्रसाद से भरे थालो में थूक दिया जाता था | वह गन्दा थूक से भ्रष्ट प्रसाद चेलो में बाटा जाता था |

इसी प्रकार राधा स्वामी गुरू के थूक तक को पीना की शिक्षा देते हैं...

"जब गुरू महाराज पीक फैंकना चाहे तो पीकदान पेश करे और पीकदान साफ करते समय पीक फैंकने के बजाय उसे पी जावें |" (वही पुस्तक पृ० १३०)

इसी बात को सारबचन पृ० ७७९ में भी कहा गया हैं...

"पीक दान लै पीक करावै | फिर सब पीक आप ही जावै ||"

मित्रों अब आप जान गये होगें किस प्रकार ये गुरूडम लोगों को आचार, विचार और व्यवहार प्रत्येक दृष्टि से भ्रष्ट कर रहा हैं अन्तः में मैं बस यहि कहुगाँ कि यदि हमें पुनः अपने अतीत का गौरव प्राप्त करना है तो इन सभी गुरूडमों का त्यागकर सभी सत्य विद्याओं की पुस्तक वेद और वैदिक धर्म की ओर लौटना होगा |

ओ३म्...!
जय आर्य ! जय आर्यावर्त !!

पाखण्ड खण्डण... वैदिक मण्डण... रिटर्न.....
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