Skip navigation.
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

राजधर्म( राजा किस प्रकार का हो) - सत्यार्थ प्रकाश (षष्ठ‌समुल्लासः)

राजधर्म

अब मनु जी महाराज ऋषियों से कहते हैं कि चारों वर्ण और चारों आश्रम के व्यवहार कथन के पश्चात राजधर्मों को कहेंगें कि जिस प्रकार का राजा होना चाहिये और जैसे इसके होने का सम्भ‌व तथा जैसे इसको परम सिद्धि प्राप्त होवे उसको सब प्रकार कहते हैं ||1||

कि जैसा परम विद्वान ब्राह्मण होता है वैसा विद्वान सुशिक्षित होकर क्षत्रिय को योग्य है कि इस सब राज्य की रक्षा यथावत करें ||2||

उसका प्रकार यह है -

त्रीणिं राजाना विदथे पुरूणि परि विश्वानि भृषथः सदांसि || ऋ. म.3|सू.38/म्.6

ईश्वर उपदेश करता है कि (राजाना) राजा और प्रजा के पुरुष मिल के (विदथे) सुखप्राप्ति और विज्ञानवृद्धिकारक राजा प्रजा के सम्बन्ध रूप व्यवहार में (त्रीणि सदांसि) तीन सभा अर्थात विद्यार्य्यसभा धर्मार्य्यसभा,राजार्य्यसभा नियत करके बहुत प्रकार के समग्र प्रजासम्बन्धी मनुष्यादि प्राणियों को सब और से विद्या,स्वातन्त्र्य, धर्म, सुशिक्षा और धनादि से अलंकृत करे |

तं सभा च समितिश्च सेना च ||1|| अथर्व.का.15/अनु.2/व.9/म.2

सभ्यः सभां में पाहि ये च सभ्याः सभासदाः ||2|| अथर्व.का.19/अनु.7/व.559/म.6

उस राजधर्म को तीनो सभा संग्रामादि की व्यवस्था और सेना मिलकर पालन करें ||1||

सभासद् और राजा को योग्य है कि राजा सब सभासदों को आज्ञा देवे कि हे सभा के योग्य मुख्य सभासद् तू मेरी सभा की धर्मयुक्त व्यवस्था का पालन कर और जो सभा के योग्य सभासद् हैं वे भी सभा की व्यवस्था का पालन किया करें ||2||

इसका अभिप्राय यह है कि एक को स्वतन्त्र राज्य का अधिकार न देना चाहिये किन्तु राजा को सभापति तदधीन सभा, सभाधीन राजा, राजा और सभा प्रजा के अधीन और प्रजा राजसभा के अधीन रहै | यदि ऐसा न करोगे तो -

राष्ट्रमेव विश्या हन्ति तस्माद्राष्ट्री विशं घातुकः ||विशमव राष्ट्रायाद्यां करोति तस्माद्राष्टी विशमत्ति न पुष्टं पशुं मन्यत इति ||1|| शत. का.13/अनु.2/ब्रा.3

जो प्रजा से स्वतन्त्र स्वाधीन राजवर्ग रहैं तो राज्य में प्रवेश करके प्रजा का नाश किया करें | जिसलिये अकेला राजा स्वाधीन व उन्मत होके प्रजा का नाशक होता है अर्थात वह राजा प्रजा को खाये जाता है इसलिये किसी को राज्य में स्वाधीन न करना चाहिये | जैसे सिंह वा मांसाहारी ह्रष्ट पुष्ट पशु को मारकर खा लेते हैं, वैसे स्वतन्त्र राजा प्रजा का नाश करता है अर्थात किसी को अपने से अधिक न होने देता, श्रीमान को लूट खूंट अन्याय से दण्ड दे के अपना प्रयोजन पूरा करेगा | इसलिये ‍

इन्द्रा जयाति न परां जयाता अधिराजो राजसु राजयातै |
चर्कृत्य ईड्यो वन्द्यश्रोपसद्यो नमस्यो भवेह || अथर्व. का.6/अनु.10/व.98/म.1

हे मनुष्यो ! जो मनुष्यों के समुदाय में परम ऐश्वर्य का कर्त्ता शत्रुओं को जीत सके, जो शत्रुओं से पराजित न हो, राजाओं में सर्वोपरि विराजमान, प्रकाशमान हो, सभापति होने को अत्यन्त योग्य, प्रशंसनीय गुण कर्म स्वभावयुक्त, सत्करणीय समीप जाने और शरण लेने योग्य, सब का माननीय होवे उसी को सभापति राजा करें |

इमं देवा................|| यजु. अ.9/म.40

हे विद्वानो राजप्रजाजनो तुम इस प्रकार के पुरुष को बड़े चक्रवर्ति राज्य, सबसे बड़े होने, बड़े बड़े विद्वानो से युक्त राज्य पालने और परम ऐश्वर्ययुक्त राज्य और धन के पालन के लिये सम्मति करके सर्वत्र पक्षपातरहित पूर्ण विद्या विनययुक्त सबके मित्र सभापति राजा को सर्वाधीश मान के सब भूगोल शत्रुरहित करो | और‌ -

स्थिरा वः सन्त्वायुवा........|| ऋ. म.1/सू.39/म.2

ईश्वर उपदेश करता है कि हे राजपुरुषो ! तुम्हारे आग्नेयादि अस्त्र और शतघ्नि, भुशुण्डी, धनुष वाण, करवाल (तलवार‌) आदि शस्त्र शत्रुओं के पराजय करने और रोकने के लिये प्रशंसित और द्दृड़् हों और तुम्हारी सेना प्रशंसनीय होवे कि जिससे तुम सदा विजयी होवो परन्तु जो निन्दित अन्यायरूप काम करता है उसके लिये पूर्व चीजें म‌त हों अर्थात जब तक मनुष्य धार्मिक रहते हैं तभी तक राज्य बढ़ता रहता है और जब दुष्टाचारी होते हैं तब नष्ट भ्रष्ट हो जाता है |

(नोट - विस्तार‌ के लिये कृप्या सत्यार्थ प्रकाश पढ़ें)
.