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कृण्वन्तो विश्वमार्यम्

om om kaho

आर्य राजेन्द्र
Submitted by Rajendra P.Arya on Wed, 2013-04-24 07:52. भजन/कविता
ओम् ओम् कौह (पथिक भजनोपहार )
ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह !
छड के कुसंग सत्संग विच बौह !
अपनेंयां पैरां नू संभाल रखना !
माडे पासे जाण न ख़याल रखना !
पानियाँ ने मंजिला ते सिधे राहे पौह !
ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह !......
चंगे चंगे कम हथां नाल करिये !
जेहडा कम करिये कमाल करिये !
हस के मुसीबतां नूं सिर उत्ते सौह !
ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह......
जग ते बेशक रंग कई वेखणा !
अखियाँ दे नाल सदा सही वेखणा !
कन्नां नूं बुराई तों बचा के रख लौह !
ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह .....
निकी जिन्नी गल दा पहाड़ वेखेया !
बने होए कम्मा दा विगाड़ वेखेया !
एहदे नालों चंगा ए “पथिक” चुप रौह !
ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह.....
(यह भजन श्रद्धेय पथिक जी ने जब संगरूर आर्यसमाज में गाया तो मेरी धर्मपत्नी शांता रानी आर्या को बहुत पसंद आया और गर्भावस्था के दौरान रोज गुनगुनाती थी जिसका प्रभाव ये हुआ की जब मेरा नवजात पुत्र मनीष आर्य रोने लगता तो मेरी धर्मपत्नी गाने लगती “ ओम् ओम् कौह ते सदा सुखी रौह” तो मनीष रोना बंद कर देता था ! इस चमत्कारिक सूचना के लिए मैंने पथिक जी को पत्र लिखा था ) राजेन्द्र आर्य, संगरूर (पंजाब) ९०४१३४२४८३

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